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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 401 of 519

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Page 401

३०० स्पन्दकारिका
है वही है शिवसद्भाव। इसके द्वारा 'अहमेवास्मि' (मैं ही हूँ)—इस अबाधित प्रतिपत्ति
का अनुभव सिद्धावस्था में हुआ करता है। इस अनुभव को प्रदान करने वाली—'शिव
सद्भावदायिनी'।
यह एक निरुत्तर संस्कार है और यह सुप्रबुद्ध गुरुओं को ही अनुभूत होता है अन्य
को नहीं। यह क्या है? यह है परमशिवात्मकस्वरूप की प्राप्ति। यह कोई बाह्य साधनों
से साध्य विधिविशेषात्मक विधि नहीं है।
'दीक्षा के समय गुरु शिष्य की आत्मा को ग्रहण करें' 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षा-
काले गुरुर्धिया'—ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। अतः सुस्पष्ट है कि दीक्षावसर पर गुरु
शिष्य की आत्मा का ग्रहण करते हैं।
भट्टकल्लट की व्याख्या का सारांश—'इयमेव .... ग्रहः ॥
(१) यही वह मिथ्याज्ञानशून्य साधक की निरावरणस्वस्वरूप संवित्त। यह किसी
भौतिक पदार्थ (धातुसार से निर्मित स्थूल वस्तु) का रसास्वाद नहीं है और न तो इसकी
प्राप्ति अमृतत्व प्राप्ति ही है।
'पारद' रस कहलाता है। 'रस' से निर्मित औषधियाँ चिरञ्जीवत्व प्रदान करती हैं
और शक्तिदायिनी होती हैं किन्तु उन्हें तथा सामुद्र पीयूष को अमृत नहीं कहा गया है।
'आत्मग्रह' आत्मा की अनुभूति है। यह तब होती है जब मन्त्र के उच्चारण से
मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति होती है—अर्थात् मन्त्र-देवता के साथ स्वरूपसाक्षात्कार की
स्थिति प्राप्त होती है। अन्तर्विमर्श की स्थिति में शिष्य को प्रदत्त मन्त्र की देवता के
स्वरूप में अवस्थान ही 'आत्मग्रह' है।
(२) आकारशून्य आत्मा को मिट्टी के ढोंके या किसी अन्य स्थूल पदार्थ की भाँति
हाथ से पकड़ा नहीं जाता। इस कारण यह आत्मानुभूति ही 'निर्वाण दीक्षा' होती है।
यह साधक के भीतर अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर देती है।
इच्छतः = इच्छया ॥ भट्टकल्लट ने 'इच्छतः' का अर्थ इच्छा ही किया है।
प्रश्न है कैसी इच्छा?
(१) 'परा' गता इच्छा = सूक्ष्मतम आत्मस्पर्श = आन्तरिक विमर्श से संबद्ध
अव्यक्त ध्वनि ॥
(२) पश्यन्ती गता इच्छा = सूक्ष्मतर आत्मस्पर्श = अव्यक्त ॥
(३) मध्यमा गता इच्छा = सूक्ष्म आत्मस्पर्श = अव्यक्त ध्वनिरूपा ॥
(४) वैखरी गता इच्छा = स्थूल आत्मस्पर्श = व्यक्त ध्वनिरूपा ॥
स्थूल शब्दोच्चारण की स्थितियाँ—(१) आन्तर्विमर्शात्मिका, अव्यक्त नाद से
सम्बद्ध ॥ अन्तर्मुख। (२) अव्यक्तानुगामिनी व्यक्तध्वनिमयी, वैखरीमयी ॥ बहिर्मुख
इच्छतः पद में (मन्त्रोच्चारण के संदर्भ में) विमर्शात्मिका अव्यक्त इच्छा ॥
('शाक्तोपाय' वाले साधकों के सभी कार्य विमर्शात्मक होते हैं।)