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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 386 of 519

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Page 386

द्वितीयः निष्यन्दः २८५
प्राप्ति हो जाने से वह साधक जीवितावस्था में ही ईश्वरवत् मुक्त है। आत्मबोध में
सम्यक् विश्रान्ति हो जाने पर जो अलुप्तानुभव है रूप में स्थित है वह तत्त्ववित्
विषयोपभोग करता हुआ भी जीवन्मुक्त रहता है—
‘सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः ।
विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥’१
जिन लोगों की यह मान्यता है कि उत्क्रान्ति के बिना मोक्ष नहीं होता उनका पक्ष
असमीचीन है क्योंकि—‘यदि स्वभाव का अनुभव किये बिना ही केवल उत्क्रान्ति के बल
से पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति हो जाय तो जो मूर्ख फाँसी पर चढ़कर मरता है उसको भी
मोक्ष मिल जाय’।
‘बिना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् ।
अत्राऽपि पक्षे ननु मोक्षभाक्त उद्बन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥’
यह भी कहा गया है कि ‘गुण वासना वासित पुरुष भी प्रलयकाल में विदेह होने
पर भी बद्ध ही रहते हैं। विशुद्ध ज्ञान के आश्रय से शरीरधारी भी मुक्त हो जाते हैं।’—
‘विदेहा अपि बुद्ध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः ।
शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥’२
‘ज्ञानगर्भ’ में भी कहा गया है—‘हे त्रिलोकीनाथ! जो मनुष्य आपकी उपासना
करके किल्बिष रूप उपद्रवों का नाश कर चुके हैं उन्हें बहुत शीघ्र ही अद्वैत भावना के
आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह भावना के आवेश से यह
अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह समस्त जगत् स्थित है। मैं ही सब हूँ एवं मैं
ही सर्वत्र हूँ।’ यह संवित् किस स्वरूप का है?—इसी अभिप्राय से कहा गया है—
‘तेन शब्दार्थचिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥’
—जिसकी इस प्रकार की संवित्ति है वह ‘जीवन्मुक्त’ है।३
अर्थात् शब्द चिन्तारूप एवं अर्थचिन्तारूप ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिव
न हो—यही संवित्ति ‘जीवन्मुक्ति’ है।
जीवन्मुक्त कौन है? ‘Who possess this sort of recognition or he
who regards this whole universe as a play and is always united, is
beyond doubt liberated in life’.
वा—यह शब्द प्रथम निष्यन्दोक्त निमीलन समाधि को विकल्पित करते हुए
उसकी समापत्ति की दुर्लभता को ध्वनित करता है। अतः उसका यह अर्थ है—इस
प्रकार की संवित्ति दुर्लभा है। इसका ज्ञान केवल उसको होता है जो जन्म-मरण के चक्र
से निर्मुक्त है।
१-२. स्पन्दप्रदीपिका। ३. रामकण्ठाचार्य (स्पन्दकारिकाविवृति)।