Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 385 of 519

Read in context
Page 385

२८४ स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट कहते हैं—जिस योगी का यह विश्वात्मक स्वभाव हो अर्थात्—'यह
समस्त जगत् मन्मय है'—वह समस्त जगत् को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते रहने तथा
नित्ययुक्त (अपने चिरन्तन आत्मस्वभाव से अपृथक्) रहने के कारण जीवित रहता हुआ
भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है तथा उसकी शरीरादिक वस्तुओं पर कोई भी
(प्रतिबन्धात्मक, आवरणात्मक मायात्मक) बन्धन नहीं रहता (अर्थात् सारे बन्धनों से मुक्त
रहता है) ।¹
जीवन्मुक्ति का स्वरूप—
इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ३० ॥
जिसका (जिस योगी का) ऐसा संवेदन हो कि समस्त विश्व मेरी क्रीडा है—वह
संपूर्ण विश्व को अपनी क्रीडा के रूप में देखता हुआ चारों ओर से (सभी जागतिक
भावों के साथ) युक्त (समस्त पदार्थों के साथ तद्रूपतावश उनसे एकाकार) होता हुआ
'जीवन्मुक्त' (कहलाता) है—इसमें कोई शंका नहीं है ॥ ३० ॥

  • सरोजिनी *
    इस कारिका में आत्मा की विश्व के साथ अभेदात्मकता एवं 'विश्वोऽहं' के
    विमर्श में 'जीवन्मुक्तित्व' का प्रतिपादन किया गया है । परमात्मा तो विश्ववपु है ही
    किन्तु मितात्मा भी विश्ववपु है । परमात्मा तो अपनी अखण्ड स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति
    के द्वारा अनन्त प्रमाता-प्रमेयों, वेदक-वेद्यों से पूर्ण जगत् को अस्तित्व प्रदान करके उन्हें
    अपने शरीर के रूप में धारण करता है किन्तु मितात्मा (पशु) अपने संवेदनों के द्वारा
    प्रत्येक भूतात्मक एवं भावात्मक पदार्थ की सृष्टि करके उन्हें अपने शरीर के रूप में ग्रहण
    करके अवस्थित रहता है अतः वह भी ईश्वरवत् है ।
    संवित्ति = ज्ञान । संवेदन ।
    अखिल = समग्र ।
    वा = 'वा' शब्द का प्रयोग स्वार्थ में है । वा = किं बहुना ॥ कहाँ तक कहें?
    इति = इस प्रकार (उक्त प्रकार रूप) ।
    क्रीडात्वेन = क्रीडाराम, खेलने का बगीचा । 'खेलने के बगीचे के रूप में ।।'
    पश्यन् = विभावयन् । विभावित करता हुआ ।
    जीवन्मुक्ति = जीते हुए भी ईश्वरवत् मुक्त ।²
    जीवन्मुक्ति और उसका स्वरूप—
    स्पन्दशास्त्र में मुक्ति का स्वरूप = 'जीवन्मुक्ति'—बहुत कहाँ तक कहें? जिसको
    इस प्रकार की 'संवित्ति' (ज्ञान) हो गया है कि समस्त दृश्यमान जगत् मेरा ही स्वरूप
    है—मन्मय है वह समग्र जगत् को अपने खेल के बगीचे के रूप में देखता है क्योंकि वह
    नित्ययुक्त एवं नित्यमुक्त है । बन्धन के कारण अज्ञान के नष्ट हो जाने पर एवं प्रबोध की
    १. स्पन्दसर्वस्व । २. स्पन्दप्रदीपिका ।