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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 375 of 519

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Page 375

२७४ स्पन्दकारिका
कोई अपूर्णमन्यता मन्तव्य नहीं है प्रत्युत् चिद्घनशिवस्वभावता ही भंग्योपदेश द्वारा यहाँ
प्रतिपाद्य है ।¹
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की
है—यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह स्वीय संवेदनों के माध्यम से प्रत्येक भाव का
सृजन करता है । अनुभव में आने वाला प्रत्येक पदार्थ उसके संवेदन का विषय बन
जाता है । यह मितप्रमाता किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के अनन्तर उसे
अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है । इसका शरीर मात्र सिर, पैर आदि अंगों
वाला शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् बाह्यार्थ भी अनुभव के विषय बन जाने पर उसका
शरीर बन जाते हैं—
'सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थ-
मनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरः पाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम्' ।।
'तेन शब्दार्थचिन्तासु ..... संस्थितः ।'
इस कारिका की व्याख्या भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस प्रकार की
है—'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो न त्वन्यत्
भोग्यमस्ति ।। २९ ।।
साधकों के चित्त में 'मन्त्र' लीन हो जाते हैं और इस प्रकार आत्मा ही शिव है ।
इसको प्रमाणित करने हेतु ग्रन्थकार ने २८, २९ कारिकायें कही हैं ।
उत्पलदेव कहते हैं—
सह साधकचित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् ।
शिवात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥
बोद्धा होने के कारण जीव या आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है ।
उत्पलदेव कहते हैं—
'यस्माज्जीव आत्मैव सर्वमयः सर्वात्मको विश्वरूपः बोद्धृरूपत्वात् । कहा भी
गया है—तत्त्व ज्ञान के होते ही सब चिन्मय हो जाता है । वेद्य का ऐसा कोई भाग नहीं
है जो कि वेदक से बाहर हो । 'वेद्य' ही वेदक है । 'वेदक' संवित् है । 'संवित्' आत्मा
है ।' तब तो सबसे बड़ा यथार्थ यही है कि—आत्मा ही जगत् है ।
'यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् ।
यन्नास्ति भागो वेद्योऽसौ नाथ यो वेदकाद् बहिः ॥
वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मकम् ।
संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ।।'
छान्दोग्य श्रुति में भी कहा गया है—
'आत्मैवेदं जगत् सर्वं नेह नानास्ति किंचन' ।।' (छा० ३।९।१२)
१. स्पन्दनिर्णय ।