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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 374 of 519

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Page 374

द्वितीयः निष्यन्दः २७३
जिससे कि पशुप्रमाता सर्वमय है क्योंकि (पशुप्रमाता भी प्रति प्रमाता की भाँति
जगत् के समस्त) भावों (घट, पट आदि) के साथ संवेदनस्वरूप तादात्म्य प्राप्त करके
समस्त भावों की सृष्टि करता रहता है ॥ २८ ॥
अतः शब्द (वाचक) एवं अर्थ (वाच्य) की चिन्ताओं (विमर्शन) में ऐसी कोई
अवस्था ही नहीं है जो शिवरूपात्मिका न हो । नित्य रूप से (सदैव) सर्वत्र भोक्ता
(आत्मा) ही भोग्य (प्रमेय पदार्थ) के रूप में अवस्थित है ॥ २९ ॥

  • सरोजिनी *
    शिव सर्वत्र स्थित है, सदैव स्थित है, सर्वव्यापक है । इसी प्रकार जीव भी सर्वत्र
    स्थित है, सदैव स्थित है, एवं सर्वव्यापक है । जीव 'सर्वमय' है । शब्द एवं अर्थ के
    माध्यम से व्यक्त ऐसी कोई संवेदनात्मक अवस्था ही नहीं है जो शिवात्मक न हो ॥
    सारांश यह कि—आत्मा ही शिव है । आत्मा ही जगत् है । यह सब जगत् आत्मा ही
    है । सब चिन्मय है ।
    इस श्लोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि—शुद्धसृष्टि तो शिवस्वभावा है
    ही किन्तु जो मायादि रूपा अशुद्ध सृष्टि है वह भी शिवस्वरूपा है ।¹
    सृष्टि के दो रूप हैं—(१) शुद्धा सृष्टि (२) अशुद्धा सृष्टि ।
    जीवात्मा समस्त विश्व के साथ अभिन्न है क्योंकि समस्त वस्तुओं का सृजन
    उसी एक के द्वारा किया गया है क्योंकि वह समष्टि का (हस्तामलकवत् एक साथ ही)
    ज्ञान प्राप्त करता है और सर्वव्यापक है—विश्वव्यापकत्व प्राप्त है । अतः ऐसी कोई
    अवस्था नहीं है जो कि शिव से अभिन्न न हो । अनुभविता सर्वत्र विद्यमान है और वह
    अनुभूत पदार्थ के रूप में भी विद्यमान है ।²
    यस्मात् = जिसके द्वारा । जिसके कारण ।
    जीवः = प्राणी । ग्राहक ।
    सर्वमयः = शिववद्विश्वरूप ।
    शब्दार्थ = शब्द = वाचक । अर्थ = पदार्थ ।
    अर्थ—वाच्य ॥
    चिन्तासु = विकल्पज्ञान आदि रूपों में स्थित चिन्ताओं में ।
    सावस्था = वह अवस्था । आदि-मध्य-अन्त रूप अवस्थायें । 'सर्वमेव शिव-
    स्वरूपम् इत्यर्थः ।।' ग्राहक, भोक्ता, चिदात्मा ही भोग्य भाव से देह-नील आदि के
    रूप में सदैव नित्य रूप से सर्वत्र विचित्र तत्त्वभुवनादिक पद में स्थित हैं । कोई भी भोग्य
    वस्तु भोक्ता से भिन्न नहीं है 'न तु भोग्यं नाम किंचिद् भोक्तुर्भिन्नमस्ति ।।'³
    जीव—इस शब्द से प्रारंभ करके एवं 'शिव' शब्द से उपसंहार करने के द्वारा
    ग्रन्थकार ने—'जीवशिवयोर्वास्तवो न कोऽपि भेदः'—इस प्रकार देहादिक अवस्थाओं में
    १-३. स्पन्दनिर्णय ।
    स्पं० १८