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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 32 of 519

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Page 32

परिचय एवं पृष्ठभूमि ३१
अभिनवगुप्तपादाचार्य 'परात्रिंशिका' विवृत्ति में कहते हैं—परमात्मा अनुग्रहात्मा
है। यह पञ्चकृत्यविधायक परमात्मा अपनी अनुग्रहरूपा पराशक्ति से युक्त है और इस
पराशक्ति को किसी भी दृष्टि से शिव से यत्किंचित् भी पृथक् आमर्शन करना उचित
नहीं है—
'परमेश्वरः पञ्चविधकृत्यमयः सततम् अनुग्रहमय्या परारूपया शक्त्या आक्रान्तो
वस्तुनोऽनुग्रहैकात्मैव, नहि शक्तिः शिवात् भेदमामर्शयेत् ॥'¹
जीवों के 'अदृष्ट' के कारण सृष्टि होती है—ऐसा मीमांसक मानते हैं । कार्यों का
भोग तो आवश्यक है । विना कर्मोपभोग या कर्मों के बीजों को दग्ध किए बिना तो मुक्ति
संभव नहीं । अतः भगवान् अपनी अहेतु की कृपा से जीवों को जन्म देकर उन्हें कार्यों-
पभोग या साधनाओं द्वारा मुक्त होने का आसार प्रदान करते हैं । यह उनका अनुग्रह है ।
मुक्ति के जो उपायत्रय—शांभव, शाक्त एवं आणव है,—इनकी सफलता का
सूत्रधार भी परमेश्वर का अनुग्रह है । शास्त्रों में तो कहा गया है कि उपायजाल से मुक्ति
नहीं मिलती । मुक्ति तो परमेश्वरानुग्रह है अतः 'अनुपाय' (उपाय शून्य किन्तु परमात्मा
का शक्तिपात) ही मुक्ति का उत्कृष्टतम साधन है ।
अभिनवगुप्त 'मालिनीवार्तिक' में कहते हैं—
'अतएव पराद्वैतं यद्विक्षानुग्रहात्मकम् ॥ (२ का० १८)
अनुपायमिदं तस्मादुपायोपेययोगतः ।
भेदबंधाद्विमुच्येत कथं वेतरथा जनः ।। (द्वि०काण्ड १२०)
'नहि तस्य परा वित्तिं प्रति काचिदुपायता ॥' (मा०वि०)
जीवों को पशु अवस्था से विमर्शभूमिका में पहुँचाना भी शिव की कृपा मात्र ही
है । यही उनका शंकरत्व (कल्याणकारित्व) है । यही अनुग्रह है ।
भट्टकल्लट का 'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' व्याख्या शिव के इसी
अनुग्रह-वाद—कल्याणकारी स्वभाव, अनुग्रह शक्ति द्वारा भेदस्तर से अभेद स्तर पर
जीवों का आरोहण—का प्रतिपादन करती है ।
(१) 'शिवात्मक' = बंधन से मुक्ति, भेदस्तर से अभेद स्तर पर आरोहण,
(२) 'स्वस्वभाव' = यही शिवात्मक (अनुग्रहकारी) स्वभाव है ।
(३) 'विज्ञानदेह' = शंकर नामक वह 'स्वस्वभाव' 'विज्ञानदेह' (कल्लट के
शब्दों में) है—विमर्शात्मक स्पन्दन स्वरूप है ।
(४) 'शक्तिचक्रविभव' = स्पन्दशक्ति को एक साथ ही विशेष स्पन्दों के रूप में
प्रवाहमयता एवं अपने नित्य एवं अभेदात्मक सामान्य स्पन्द रूप में या केवली रूप में
विश्रान्त होने की स्वातन्त्र्यशील क्रियाशीलता ही शक्ति चक्र का ऐश्वर्य या चमत्कार है ।
यह ऐश्वर्य भी अनुग्रहात्मक है ।
१. परात्रिंशिका (श्लोक क्र० १) ।