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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 31

३० स्पन्दकारिका
'स्पन्ददर्शन' एवं 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' दोनों इस भूल को पहचान चुके थे अतः उन्होंने
परमात्मा एवं आत्मा शब्द को आराधक के और निकट लाने के प्रयास में 'स्व' शब्द का
प्रयोग किया—(१) 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' (का०१) की व्याख्या में—भट्टकल्लट ने
'स्वस्वभावस्यैव' द्वि०का० की व्याख्या में—'स्वस्वभावस्यैव' 'अनाच्छादित
स्वभावत्वात्' (का-३) 'न तस्य स्वरूपम् अप्रियते' 'न तस्य स्वरूपान्यथाभावः'
'स्वस्वभावः' (का० ४), (स्वस्वभावभूतस्य) (का०६,७) अपितु स्वस्वरूपे (का० ८)
स्वभावमवलोकन (का० ११) 'आत्मस्वभावः' (वृत्ति), न च आत्मस्वभाव एष (वृत्तिः
का० १२) 'स्वभावो मे विलुप्त' (का० १५ः वृत्ति) तत्स्वरूप मे (का० १६ वृत्ति)
चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य (का० १७ वृत्ति) 'स्वभावस्य' (का० १९ः वृत्ति)
'स्वस्थितेः चिद्रूपायाः' (२० वृत्ति) 'स्पन्दतत्त्वस्य (स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थ) (का० २१ वृत्ति)
स्पन्दस्वरूपरूपावस्थायाम् (२३ वृत्ति) स्वस्वभावाभिव्यक्ति (का० २५ वृत्ति) 'स्वस्वभाव
व्योम्नि (का० २७ वृत्ति) 'सर्वभावसमुद्भावात् (का०२८) सर्वात्मकेन स्वभावेन (का०
२९ वृत्ति) एवं स्वभावं यस्य (का० ३० वृत्ति) अनभिव्यक्त स्वस्वरूपस्य (३३ का०
वृत्ति), स्वरूप स्थित्यभावे (का० ३५ वृत्ति) स्वबल (का० ३६) 'बलमाक्रम्य' (का०
३७) 'स्वबलं स्वस्वरूपं (का० ३७ वृत्ति) 'स्वभावानुशीलेन (का० ३८ वृत्ति) अने-
नात्मस्वभावेन (का० ३९ वृत्ति) स्वयमेवावभोत्स्यते (का० ४३) तत्स्वभावं अवभोत्स्यते
ज्ञास्यते (का० ४३ वृत्ति) स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते (४५ वृत्ति) स्वरूपावरणे
(का० ४७) स्वस्वभावास्त्याच्छादने (४७ वृत्ति) ।।
'स्वस्वभाव' 'स्वस्वरूप' के अतिरिक्त 'स्वबल' (अर्थात् आत्मबल) 'बलं आक्रम्य'
(आत्मबलं अधिष्ठाय) आदि सभी पदों में 'स्व' का ही प्राधान्य है । जहाँ तक 'स्पन्द'
की बात है 'स्पन्द' का अर्थ ही है—'अहं विमर्श' । स्पन्द में भी 'अहं' (स्व का भाव)
सुरक्षित है ।
परादेवी एवं स्वभाव—
परादेवी भी 'स्वभावामर्शनोत्सुका' है—
'तस्यैवैषा परा देवी स्वभावामर्शनोत्सुका ।
पूर्णत्वं सर्वभावानां यस्या नाल्पं न वाधिकम् ॥' १
परमेश्वर एवं स्वभाव—
स एव सर्वभूतानां स्वभावः परमेश्वरः ।
स एव भैरवो देवो जगद्भरणलक्षणः ॥२
अनुग्रहवाद—'शङ्करं स्तुमः' (१ का०) कहकर सूत्रकार ने परमात्मा शिव के
अनुग्रहात्मास्वरूप की स्तुति की है । शिवात्मक (अनुग्रह शक्ति द्वारा शिवत्व प्राप्ति की
क्षमता वाले) या मंगलमय ।। 'शं' = मंगल 'करं' = करने वाले = अनुग्रह (मंगल)
करने वाले ।
१. स्पन्दकारिका एवं भट्टकल्लट कृत स्पन्दकारिकावृत्ति ।
२. चिद्वल्ली (कामकलाविलास) ।