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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 296 of 519

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Page 296

प्रथमः निष्यन्दः १९५
स्पन्द की अवस्थायें—
स्पन्द विज्ञान की दृष्टि में स्पन्द की दो अवस्थायें—
इस स्पन्द दर्शन में 'स्पन्द तत्त्व' की दो अवस्थाएं मानी गई हैं ।
स्पन्द की अवस्थायें—(१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता' ।
कार्यता क्षणभंगुर है, नश्वर है । कर्तृता अविनश्वर है, स्थायी है और नित्य है।
आचार्य भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि—
(क) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की निम्न अवस्थायें हैं—
(१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता'
(१) भोग्यता (२) 'भोक्ता'
(नश्वर) (अनश्वर)
(अचिद्रूप) (चिद्रूप)
(वेद्य) (वेदक)
'अवस्था युगलम्' अवस्था द्वयमेव कार्यकर्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्' तत्र यो
भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च, भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचिद्
विनश्यति तेन नित्यः ॥१
स्पन्दात्मक आत्मसत्ता के जो दो रूप हैं उनमें—(क) वेदक रूप (ख) वेद्य रूप;
(क) कर्ता (ख) कार्य; (क) भोक्ता (ख) भोग्य ।
इन दो रूपों में आत्मा का 'क' रूप—वेदक, कर्ता, भोक्ता ही नित्य है—'ख'
रूप नश्वर है ।
अहंविमर्शात्मक स्पन्द तत्त्व पूर्ण स्वतन्त्र है। इसमें दो अवस्थायें अखण्ड रूप में
निरन्तर स्पन्दायमान हैं जो निम्न हैं—
(क) 'सामान्य अवस्था' । (ख) 'विशेष अवस्था' ।
सामान्यावस्था—समस्त उपरागों से शून्य, विशुद्ध, चिद्रूप । यही है कर्तृत्व
की अवस्था । इसमें समस्त बाह्य प्रमेय समूह, विभाग शून्य, 'अहं विमर्श' के रूप
में स्थित हैं ।
विशेष अवस्था उस दशा का नाम है जिसमें मूल चिद्रूपता, स्वोत्पन्न अज्ञान के
द्वारा, स्वस्वरूप को आच्छादित करके देह, प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ या घट
पट आदि अनन्त जड़ वेद्य वस्तुओं के रूप में अवभासित होती है। यही है कार्यता,
भोग्यता, वेद्यता एवं प्रमेयता की अवस्था ॥
आचार्य अनिभवगुप्तपाद कहते हैं कि—मूल तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की
सामर्थ्य से वेदक एवं वेद्य दोनों रूपों में अवभासित होता है तत्त्व एक साथ ही कर्ता-
कार्य, अपरिणामी-परिणामी, अचल-चल, अनश्वर-नश्वर, भोक्ता-भोग्य आदि सभी है—
१. भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व' ।