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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 295 of 519

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Page 295

१९४ स्पन्दकारिका
वह एक ऐसी अवस्था है जो स्वतन्त्र है तथा द्वितीय अवस्था इसके विपरीत कार्यरूपा,
भोग्या, वेद्या, जड़ात्मिका एवं परतन्त्रात्मिका है । 'शब्दितं' = 'शब्दितं' कहकर यह
सूचित किया गया है कि इन दोनों अवस्थाओं को भिन्न-भिन्न रूप में समझने के लिए
शब्द तो दे दिया गया है किन्तु उनमें वास्तविक भेद नहीं है । यह कार्यरूपा अवस्था
प्रकाशमानता से अपनी सत्ता प्राप्त करता है और प्रकाशमान है परमात्मा । चूँकि 'कार्य'
किसी कर्ता पर निर्भर है अतः कार्य एवं कर्ता तत्त्वतः भिन्न नहीं है । प्रकाशमान कार्य,
प्रकाशैकस्वभाव से अभिन्न हैं । कर्तृरूपावस्था नित्या है, नित्योदित है, सर्वावस्थाव्यापक
और अविनाशी है । 'कार्य' उदय-व्यय के सम्बन्ध के कारण नश्वर है ।¹
नित्योदित होने के कारण सदा प्रकाशमान होने पर भी वह तत्त्व अप्रत्यभिज्ञायमान
होने के कारण बन्धन का कारण है । अतएव लब्धोपदेश द्वारा सभी अवस्थाओं में वेद्य
एवं वेदक रूप दो तत्त्वों से संगृहीत विश्व प्रपञ्च के भेदात्मक होने के कारण वेदकांश को
'मैं हूँ' अर्थात् मैं समस्त वेद्यों के स्वरूप से परे हूँ इस प्रकार परामर्श करना चाहिए ।
इसी तथ्य का उपदेश देने हेतु अपनी माया से उद्भासित द्वैतात्मक रूप का प्रतिपादन
करने हेतु ग्रन्थकार चौदहवीं कारिका कह रहा है ।
भट्टकल्लट (स्पन्दकारिकावृत्ति) में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—(१)
स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की जो दो अवस्थायें होती हैं उनके नाम हैं— 'कार्यता' और
'कर्तृत्व' । इसमें एक भोग्य है दूसरा भोक्ता है ।
(२) 'भोग्य' उत्पन्न एवं नष्ट दोनों होता है ।
(३) 'भोक्ता' चिद्रूप होने के कारण न तो उत्पन्न होता है और न तो नष्ट होता है
प्रत्युत वह नित्य है ।
अभिनवगुप्त कहते हैं कि परतत्त्व का स्वातन्त्र्य सदैव निरावरण होता है ।
परतत्त्व 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में अवभासमान रहता है । यह तत्त्व एक साथ
ही 'कर्ता' एवं 'कार्य' दोनों की भूमिकायें निभाता है । कर्तृता की अवस्था—
अपरिणामी, अक्षर, अविचल, नित्य कार्यता की अवस्था—परिणमनशील, क्षर, चल,
अनित्य एवं नश्वर ।।
'स्पन्द' के जो दो रूप हैं—उनके पक्ष भी दो हैं—
१) कर्तृत्व पक्ष २) कार्यत्व पक्ष
(वेदक पक्ष) (वेद्य पक्ष)
(शक्ति का वास्तविक अनश्वर रूप) (देश, काल के प्रभाव से प्रभावित
होने के कारण उदयास्तमय, नश्वर)
अन्ततः कार्यता उपसंहृत होकर कर्तृत्व अंश में विश्रान्ति लेती है और निर्मल
ज्ञानक्रियात्मक चिद्रूप में अवभासमान रहती है । समाधि की अवस्था में इस कार्यतापक्ष
का लोप हो जाता है ।
१. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।