स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२६ स्पन्दकारिका
'शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते' । 'शंकर' तो निस्पन्द है फिर स्पन्दस्वरूप
जगत् का उदय होगा किसके द्वारा? 'शक्ति' के द्वारा ही होगा, क्योंकि—'सृष्टिस्तु
कुण्डली ख्याता' ।
अर्थात् 'सृष्टि' शक्ति है। निष्कर्ष यह कि जगत् के प्रलय-उदय का निष्पादक
औपचारिक (अप्रत्यक्ष) दृष्टि से भले ही शिव हो किन्तु प्रत्यक्षतः तो इसका निष्पादन
'शक्ति' द्वारा ही संभव हो पाता है—क्योंकि वही तो 'सृष्टि' है, वही तो 'जगत्' है—वही
तो 'इच्छा' है—वही 'ज्ञान' है—वही 'क्रिया' है—वही 'चैतन्य' है और वही 'आनन्द'
है। 'जगत्' उसी शक्ति का विकसित रूप है। वही शिव की भी शक्ति है—'सार' है
'विमर्श' है—'हृदय' है।
(२) अजातिवाद एवं उदयवाद—गौड़पादाचार्य (अद्वैत वेदान्ती) ने माण्डूक्य
कारिकाओं में 'अजातिवाद' का प्रतिपादत किया था। भले ही 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' के
आचार्य इसे 'अजातिवाद' का अभिधान न दें किन्तु प्रतिपादन तो उसी सिद्धान्त का
करते हैं क्योंकि कारिकाकार का कथन है—'जिसके द्वारा प्रलय एवं उदय के कृत्य
निष्पादित किये जाते हैं वह निमेषोन्मेषात्मिका स्पन्द शक्ति है।'
'उदय' के स्थान पर उत्पत्ति (अविर्भाव) का प्रयोग क्यों नहीं किया गया ।
'उत्पत्ति' उसकी होती है जो पहले कभी न रहा हो और जो बाद में भी नहीं रहेगा—यथा
'घट' 'पट' आदि । किन्तु 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञाशास्त्र' का मत है कि 'जगत्'
'शक्ति' के विकास के समय स्थूल जगत् के रूप में—स्थूल 'इदम्' के रूप में 'अहं'
से पृथक् होकर रहता है और 'प्रलय' के समय यह 'इदम्' (जगत) शक्ति की कुक्षि में
'अहं' में लय होकर—अहमाकार होकर रहता है अतः जगत् जो पहले से ही कारण रूप
शक्ति में नित्य विद्यमान है उसकी उत्पत्ति (नव्याविर्भाव) कैसे संभव है? उत्पत्ति तो
उसकी होती है जो पहले अस्तित्व में था ही नहीं। इन्हीं दृष्टियों से कारिकाकार ने—
'प्रलयोदयौ' शब्दों का प्रयोग किया न कि 'संहार अविर्भावौ' पदों का । यही
स्पन्दशास्त्रीय 'उदयवाद' 'उन्मेषवाद' भी कहलाता है।
स्पन्दशास्त्र मानता है कि किसी भी वस्तु की नव्य उत्पत्ति नहीं होती—केवल
उसकी (अपनी अव्यक्तावस्था से) अभिव्यक्ति—व्यक्तता होती है और संसारी लोग उसे
प्रादुर्भाव या उत्पत्ति मानते हैं। यूनान का दार्शनिक Plato भी यही मानता था और इसी
के समतुल्य विचार Platinus के भी थे। ये दोनों दार्शनिक भी स्पन्दशास्त्रियों की भी
दृष्टि रखते थे।
'जहाँ तक' 'प्रलय' ('प्रलयोदयौ') शब्द के प्रयोग की बात है वह अत्यन्त
समीचीन है क्योंकि यह 'संहार' का द्योतक नहीं प्रत्युत 'कार्य' के अपने 'कारण' में
'लय' (निमज्जन) होने या 'व्यक्त' के अपनी मौलिक सत्ता या मूल स्वरूप 'अव्यक्ता-
वस्था' में प्रत्यावर्तित होने का द्योतक है।
(३) 'क्रीडावाद'—'व्यक्त' का 'अव्यक्त' में छिप जाना या अव्यक्त का व्यक्त
रूप से प्रकाशित हो उठना, पतिभूमिका से पशुभूमिका में अवतरण होना या पशु भूमिका