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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 26

परिचय एवं पृष्ठभूमि २५
'ततःस्वातंत्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति।
विमर्शनं विशेषाख्य, स्पन्द औन्मुख्य संज्ञितः ॥'१ (५।८१)
'स्वातंत्र्योत्यापिजे तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते
यदिदमिति विमर्शनं स विशेषाख्यः स्पन्दः ॥'२
'औन्मुख्य' (इदमात्मक विमर्श = 'स्पन्द') विच्छिन्नविमर्श है यह एक आधार
का कार्य करता है। इदमात्मक विश्रान्ति की इस भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श
में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है।३ उस दशा में ये ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ भी
दिव्य हो जाती है। 'बोध' एवं 'स्वातंत्र्य' ही इनका पर्याय है। अभिनवगुप्त कहते हैं—
प्राण में 'स्पन्द' होता है। 'स्पन्द' से संयोग-विभाग भी अपने आप होते हैं। प्राणस्पन्द
के अभाव में इसका भी अभाव निश्चित है।४
'सा चेदुदयते स्पन्दमयी तत्राणगा ध्रुवम्।
'भवेदेव ततः प्राणस्पन्दाभावे न सा भवेत् ॥ ७.२८ ॥'५
स्पन्दशास्त्र की प्रथम कारिका संपूर्ण स्पन्दशास्त्र का निष्कर्ष, सार या निचोड़ है।
ध्यातव्य बिन्दु निम्न है—
१) 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां'—यह विशेषण है तो शंकर का, किन्तु उन्मेष-निमेष
है क्या? इसका शास्त्रोपक्रम के आदि शब्दों के रूप में प्रयोग क्यों किया गया ? इसका
उत्तर यह है कि उन्मेषनिमेषात्मिका स्पन्दशक्ति को प्रामुख्य देने हेतु इसका मंगलाचरण
के आदि पदों के रूप में प्रयोग किया गया है। निष्कर्ष—स्पन्दशास्त्र शक्ति-प्राधान्य को
स्वीकार करता है।
(१) सर्वशक्तिवाद—कारिकाकार कहते हैं कि जिसके 'उन्मेष' एवं 'निमेष' के
द्वारा जगत् के उदय एवं प्रलय के कार्य संपन्न होते हैं। भाव यह है कि 'स्पन्दशास्त्र' का
प्रणेता उस शंकर की वन्दना करता है।
(१) जो शक्तिसमन्वित है ('ब्रह्म' की भाँति शक्तिहीन या स्पन्द-हीन नहीं है)।
(२) वह शक्ति शिव को कृत्यकारी बनाती है; ५ कृत्यों की संपादिका बनाती है।
(३) जिस शक्ति (उन्मेषनिमेषात्मिका स्पन्दशक्ति) के द्वारा ही शिव जगत् का
'प्रलय' एवं 'उदय' कर पाते हैं और जिसका सहयोग न पाने पर वे कुछ भी नहीं कर
सकते।
(४) उस (उन्मेषनिमेषात्मिका) स्पन्द शक्ति का स्व स्वरूप ही 'जगत' है।
'शक्ति' जगत् का उपादान कारण हैं। 'शक्ति' ही 'जगत्' है। दो पदार्थ तो हैं
ही—(१) 'शक्ति', (२) शक्तिमान।


१. तन्त्रालोक। २. तन्त्रालोक—विवेक (५/८१)।
३. विवेक (५/८२)। ४. विवेक (७/२८)।
५. तन्त्रालोक (७/२८)।