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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 266 of 519

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Page 266

प्रथमः निष्यन्दः १६५
१७) ब्रह्मपुराण में कहा गया है—'जिससे समस्त विश्व की (१।९।५४) सृष्टि
हुई है वही विष्णु परब्रह्म है। जो जगत् रूप है, जिसमें जगत् है और जिसमें जगत् का
प्रलय हो जाता है वही परब्रह्म परमधाम एवं सदसत 'परमपद' है—
स च विष्णुः परं ब्रह्म यतः सर्वमिदं जगत्।
जगच्च यो यत्र चेद यस्मिन् विलयमेष्यति।
तद् ब्रह्म परमं धाम सदसत परमं पदम्॥ (ब्र०पु० २३४।४१-४२)
१८) मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि—
क) प्रथम मात्रा अकार (पृथ्वी, अग्नि ब्रह्मा आदि) व्यक्त है।
ख) द्वितीय मात्रा उकार (अन्तरिक्ष, विष्णु आदि) अव्यक्त है।
ग) तृतीय मात्रा मकार (द्यौ, शिव) चिच्छक्ति हैं।
घ) चतुर्थ मात्रा 'अर्द्धमात्रा' परम पद है—
व्यक्ता तु प्रथमा मात्रा, द्वितीयाव्यक्तसंज्ञका।
मात्रा तृतीया चिच्छक्तिरर्द्धमात्रा परमं पदम्॥
१९) विष्णुपुराण में कहा गया है कि—जो अविकार, अज, शुद्ध, निर्गुण,
निरञ्जन परमपद है उस परब्रह्म के प्रति हम नत होते हैं—
अविकारजं शुद्धं निर्गुणं यन्निरञ्जनम्।
नताः स्म तत्परं ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम्॥ (१।१४।३८)
२०) कठोपनिषद् में कहा गया है कि जो विज्ञानवान्, अनुभवयुक्त, मननशील
एव नित्य शुचि है वही परमपद प्राप्त करता है उसको फिर जन्म नहीं लेना पड़ता—
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते।
२१) परमपद का स्वरूप—कूर्मपुराण में कहा गया है कि—
क) यह माहेश्वरी देवी मेरी निरञ्जना शक्ति है। यह शान्ता, सत्या एवं सदानन्दा
हैं। वेद इन्हें ही 'परमपद' कहता है।
ख) 'इन निरञ्जना शक्तिरूपा, परमपद स्वरूपिणी माहेश्वरी देवी से ही समस्त
जगत् उत्पन्न होता है और अन्त में इनमें ही समस्त जगत् लीन हो जाएगा॥
ग) यही माहेश्वरी शक्ति परमपद समस्त प्राणियों की गतियों में सर्वोत्तम गति है—
एषा माहेश्वरी देवी मम शक्तिनिरञ्जना।
शान्ता सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥
अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति।
एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥ (कूर्मपुराण)
२२) श्रीमद्भगवद्गीता में परमागति का विवेचन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने
कहा है—(क) सर्व द्वाराणि संयम्य (ख) मनो हृदि निरुध्य च।