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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 265

१६४ स्पन्दकारिका
द्वारा सभी आच्छादित हैं। वही सत्य एवं 'परमपद' हैं—
'त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्तिस्रः संध्यास्त्रयः स्वराः ।
त्रयोऽग्नय त्रिगुणा स्थिताः सर्वे त्रयाक्षरे ॥
त्रयाणामक्षराणां च योऽधीतेऽत्यर्द्धमक्षरम् ॥
तेन सर्वमिदं प्रोक्तं तत्सत्यं तत्परं पदम् ॥ (योग० १३४, १३६)
१३) क) प्रणव की मात्रा 'अकार' में कमल का रेचक होता है।
ख) प्रणव की मात्रा 'उकार' में कमल प्रस्फुटित होता है।
ग) प्रणव की मात्रा 'मकार' में नाद की प्राप्ति होती है।
घ) प्रणव की मात्रा 'अर्द्धमात्रा' निश्चला होती है।
ङ) वह मल-शून्य शुद्ध स्फटिक के समान निर्मल एवं पापनाशक है।
च) योग युक्तात्मा पुरुष परम पद प्राप्त करते हैं—
परमपद का स्वरूप—अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव विद्यते ।
मकारे लभते नादमर्द्धमात्रा सुनिश्चला ॥
शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ।
लभते योगमुक्तात्मा पुरुषस्तत्परं पदम् ॥
('योगतत्त्वोपनिषद् १३८-१४०)
१४) शाण्डिल्योपनिषद् में कहा गया है कि—
'यदि वह कुण्डलिनी शक्ति कण्ठ के ऊर्ध्व भाग में प्रसुप्त रहती हो वह योगियों
को मुक्ति प्रदान करती है और शरीर के अधोभाग में प्रसुप्तावस्था में स्थित रहने पर वह
प्राणियों के लिए बन्धन का कारण बनती है। निद्रा भंग के उपरान्त वह इड़ा—पिंगला
मार्गद्वय का त्याग करके सुषुम्ना मार्ग से अग्रगमन करती है यही विष्णु का 'परमपद'
है—'सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति । बन्धनाधो मूढानाम् ।
इडादिमार्गद्वयं विहाय सुषुम्नामार्गेण गच्छेद्विष्णोः परमं पदम् ॥'
(शाण्डिल्योपनिषद् १.३७)
१५) ब्रह्मबिन्दूपनिषद्—संकल्प शून्यता रूप उन्मनी भाव ही 'परमपद' है।
विषय भोग की लालसा नष्ट हो जाने पर मन हृदय में पूर्णतया निरुद्ध हो जाता है और
वह उन्मनीभाव प्राप्त कर लेता है। यही उन्मनी भाव 'परमपद' कहलाता है—
निरस्तविषयासंगं संनिरुद्धं मनो हृदि ।
यदा यात्युन्मनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ (ब्र०उप० ४)
१६) विष्णु पुराण में कहा गया है कि—आध्यात्मिक साधना में सतत निरत
ध्यान में दक्ष योगीगण पुण्य-पाप के क्षय होने पर ॐ में ध्येय विष्णु के उस अक्षय परम
पद को देखते हैं—
यद योगिनः सदोद्युक्ताः पुण्यपापक्षयेऽक्षयम् ।
पश्यन्ति प्रणवे चिन्मयं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ (वि०पु०)