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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 219 of 519

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Page 219

११८ स्पन्दकारिका
क्रियाशील हो जाता है। वायु एवं अग्नि के संपर्क से लौहपिण्ड अग्निवत दाह-पाक के
प्रकाशन में समर्थ हो जाता है—
एषोपपत्तिहेतुस्तु दृष्टान्तो भ्रामको मणिः ॥ (—स्पन्द प्रदीपिका ।)
पञ्चम कारिका में इस परमार्थ सत् आत्मा अर्थात् शिव में समस्त वस्तु संपादन की
स्वतन्त्र शक्ति की सामर्थ्य का प्रतिपादन करने के उपरान्त अब उपादेयतमत्व का उपदेश
देने हेतु कारिकाकार कारिका युगलक क्र० ६ एवं ७ कह रहे हैं। (रामकण्ठाचार्य) ॥
कारिका ७—‘तत् तत्त्वं’ = स्वस्वभावाख्य वस्तु परमार्थसत् रूप में अवस्थित
है। ‘प्रयत्नेन’ = प्रकृष्ट यत्न के द्वारा अर्थात् संतत अविलुप्त उद्योग के द्वारा ।
‘आदरात्’ = श्रद्धातिशय के कारण ‘परीक्ष्यं’ = समस्त अनुभवात्मक दशाओं में वक्ष्य-
माणोपदेशानुसार क्रम से, वेद्य-वेदकलक्षण वाले दो तत्त्वों का विभाजन करके, वेदक के
स्वरूप का परामर्श करने की क्रिया के द्वारा आत्मा के रूप में उसका स्फुटीकरण
(परीक्षण) करना चाहिए ।
‘यतः तस्य द्वयम्’—जिससे कि उसका यह । प्रस्तुत व्याख्यान । ‘स्वतन्त्रताः
‘स्वतन्त्रता । स्वेच्छामात्राधीनसकलकार्यकर्तृत्वरूपा ।’ ‘सर्वत्र’ = समस्त देहों में या दशा
विशेष में अवस्थित ‘अकृत्रिमा’ = सहज ही । अर्थात् उपादान, सहकारी कारणा आदि
की बिना कोई अपेक्षा किये हुए, क्योंकि संसारी प्राणियों को भी उस स्वातन्त्र्य शक्ति की
महिमा के द्वारा ही सारे व्यवहारों की सम्पदा प्राप्त हुआ करती है और माया-व्यामोह के
वशीभूत होने के कारण सत्यस्वभाव के परामर्शाभाव के कारण सारे संसारी प्राणी समस्त
क्रियाओं में परतन्त्र की भाँति व्यवहार करते हैं । क्योंकि उन्हें समस्त अभीष्ट-प्रतिपादन
के लिए व्यतिरिक्त कारणों (उपादान कारण, सहकारी कारण, निमित्त कारण आदि) की
अपेक्षा रहती है । इसीलिए कहा गया है कि स्वाभाविक स्वातन्त्र्य प्राप्त करने के लिए
उस तत्त्व की परीक्षा करनी चाहिए ॥ इसका तात्पर्य यह है कि—
सुख-दुख-मोह-ग्राह्य-ग्राहक रूपों के प्रतिषेध के कारण उस अवस्तुभूत प्रमेय को
नहीं जानना चाहिए—वह एतदर्थ अवगन्तव्य नहीं है—यही उपदेश दिया गया है ।
‘इदम्’—यह ॥ ‘यह’ शब्द द्वारा निर्दिष्ट स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करने हेतु
‘यतः’ शब्द से विशिष्ट विशेषण की अब व्याख्या की जा रही है ।
किस तत्त्व की परीक्षा की जानी चाहिए?
कारिका ८—‘यतो’ = जिसके द्वारा (यस्मात्) । ‘अयं कारण वर्गः’ = यह
इन्द्रिय-समूह । अर्थात् श्रोत्र, नासिका, रसना, पाद, पाणि आदि बाह्येन्द्रियाँ, मन आदि
आभ्यन्तर १३ इन्द्रियों का समूह (‘त्रयोदशकरण समूहः’) ।
‘प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः लभते’—‘प्रवृत्तिः’—कार्योन्मुखता ॥ जिघृक्षितार्थोन्मुखता से
युक्त उन्मेषावस्था । (स्पन्दकारिकाविवृति—रामकण्ठाचार्य ।) । ‘स्थितिः’—गृहीतार्थ-
विश्रान्त्यवस्था । ‘संहृतिः’ = कृतकृत्य होने के कारण बाह्यार्थपरित्याग में स्वव्यापार से
उपरत प्रत्यस्तमयावस्था ॥ ‘लभते’ = प्राप्त करता है । (रामकण्ठाचार्य) ।