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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 218

प्रथमः निष्यन्दः ११७
लिए केवल संस्कार या Impression मात्र हैं और वे चलने फिरने आदि क्रियाओं के
प्रत्यक्ष संपादक के रूप में दृष्टिगत होते हैं।१
योगी जो कि इन्द्रियों के विषयों का साक्षात्कार कर चुके हैं वे उपदेश की अपेक्षा
नहीं रखते क्योंकि वे स्वयं ही परतत्त्व का अवधानपूर्वक अनुशीलन कर चुके होते हैं।
कुछ टीकाकारों का मत है कि 'करणवर्ग' को 'मूढः अमूढ़वत्' के साथ जोड़
देना चाहिए न कि— 'सहान्तरेण चक्रेण' (With sense of divinity)—यह कथन
निराधार है क्योंकि यह इन्द्रिय वर्ग चेतना के भोग (आनन्द) से अभिन्न है।२
ग्रन्थकार का कथन है कि—यह अपना स्वरूप इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवियों
एवं इन्द्रियों के वर्ग को स्पंदित होने आदि क्रियाओं को करने हेतु प्रेरित करता है। यह
उनके चलाने, रहने एवं नष्ट होने का भी सूत्रधार है। उसकी कृपा से करणवर्ग, जड़
होते हुए भी, उन कार्यों को संपादित करता हुआ प्रतीत होता है। ये पवित्र
इन्द्रियाधिष्ठातृ देवियाँ सृष्टि के कार्यों को संपादित करती हैं।३
यद्यपि रहस्यवादी दृष्टि के अनुसार जड़ इन्द्रियों का समूह वहाँ नहीं है किन्तु ज्ञान
के शरीर से युक्त इन्द्रियाँधिष्ठातृ देवियाँ (Sense-devinities) ही वहाँ रहती हैं।
इन्द्रियों के—अपने वैभव की रश्मियों के गोलक का निरीक्षण करते हुए एवं उनके चलने
आदि क्रियाओं का अधिष्ठातृत्व करते हुए योगीगण अपने स्वरूप का परीक्षण कर सकते
हैं। यह उनका स्वरूप शङ्कर से अभिन्न है। उपाय अत्यन्त सरल है—४
निज निजेषु पदेषु पतन्त्विमाः,
करणवृत्तय उल्लसिता मम।
क्षणमपीश मनागपि मैवभू,
त्वदविभेदरसक्षति साहसम् ॥ (उ०स्तो० ८।७)
हे देव! मेरी इन्द्रिय-क्रियायें अपनी पूर्ण क्रीड़ा में अपने-अपने विषयों की ओर
दौड़ें किन्तु मैं एक क्षण के लिए भी ऐसे आवेश में न आ सकूँ कि आपके साथ ऐकात्म्य
के आनन्द का त्याग हो सके ॥५
चार्वाक मत का खण्डन—ग्रन्थकार ने इसके द्वारा चार्वाक मत का भी खण्डन
कर दिया जो कि चेतना को इन्द्रिय धर्म मानता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की स्वानुभूति
यह साक्ष्य देती है कि वास्तविक प्रत्यय चैतन्य (Real self) की शक्ति के कारण ही
इन्द्रियाँ शक्तिमान बनती है।६
छठवें सातवें कारिका द्वारा इसका उपपादन किया जा रहा है कि वह तत्त्व जड़
नहीं है—'यतः करणवर्गोऽयं....सर्वत्रेयमकृत्रिमा ।'७
इसी स्पन्दतत्त्व से यह बाह्य करणवर्ग अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय एवं अन्तःकरण
चक्र के सार्थ मूढ़ चेतन होने पर भी विचेतन के समान स्वयं प्रवृत्ति, स्थिति एवं संहार
की अवस्थाओं को प्राप्त करता है। आप देखते ही हैं कि चुम्बक के सान्निध्य से लोहा
१-६. स्पन्दनिर्णय। ७. स्पन्दप्रदीपिका।