स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः १०९
मूढभाव का द्वितीय अर्थ—वास्तविक तत्त्व तो वह है जहाँ कि ब्रह्म की
अचेतनता का कोई रूप अस्तित्व नहीं रखता और जो कि प्रकाश के साथ एकरूप है
और जो 'विज्ञान' ब्रह्म के साक्ष्य पर ज्ञानस्वरूप है—क्योंकि यहाँ तक वेदान्तियों का ब्रह्म
भी, बिना स्वातन्त्र्यस्वरूपी स्पन्दतत्त्व की शक्ति के निष्प्राण (Insentient) है ।
प्रत्यभिज्ञा में कहा गया है कि 'विचारणा या चिन्तन प्रकाश के स्वरूप का निर्माण करता
है अन्यथा प्रकाश, चाहे वह वस्तुओं को प्रकाशित ही क्यों न करता हो स्फटिक की
भाँति निष्प्राण वस्तु ही होगा ।¹
भट्टनायक कहते हैं—'ओ देव! ब्रह्म कितना फल वहन कर सकता है क्योंकि
वह उदासीन है । यदि तुम्हारा नियामक पुरुषात्मक बल वहाँ न होता और तुम्हारी
उपासना की सुन्दर नारी के रूप में तुम्हारी नियमन करने की पुरुषात्मक शक्ति न होती
तो उदासीन (तटस्थ) ब्रह्म कितना फल वहन करता?
'नपुंसकमिदं नाथ परं ब्रह्म फलेत्किम् ।
त्वत्पौरुषी नियोक्त्री चेन्न स्यात्त्वद्भक्तिसुन्दरी ॥'
भट्टनायक वेदान्तियों के ब्रह्म को 'नपुंसक' कह रहे हैं । इस प्रकार वही मात्र
यथार्थतः सत्तावान् है जोकि सहज (अकृत्रिम) पूर्णतम, तर्क-अनुभव-आगम-प्रमाणित है
न कि नीलादिक बाह्य पदार्थ । क्योंकि गुरुदेव ने कहा है—२
'एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशास्यैव सन्त्यमी ।
जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ॥ (अजड पृ० १३)
भर्तृहरि ने भी कहा है—
'यदासौ च यदन्ते च तन्मध्ये तस्य सत्यता ।
न यदाभासते तस्य सत्यत्वं तावदेव हि ॥'
निर्जीव (निष्प्राण = जड़) वस्तुएँ असत् (Non-existent = सत्ता शून्य) की
भाँति हैं—यदि हम उनके आत्मतत्त्व की तुलना में देखें तो या प्रकाश की दृष्टि से उन्हें
देखें तो । अपनी आत्मा का प्रकाश मात्र ही सत्तावान् है ।³
इस प्रकार इस सूत्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि सर्वोच्च सत्ता (Ulti-
mate Reality) स्पन्द तत्त्व के रूप में विद्यमान है । संवित्संतानवादियों, प्रमातृतत्त्व-
वादियों, नानात्ववादियों, अभाववादियों एवं ब्रह्मवादियों का मत अनुपपन्न होने के
कारण—'पारमार्थिकं स्पन्दशक्तिरूपमेव तत्त्वमस्तीति प्रतिज्ञातम् ॥'—अर्थात् स्पन्द
शक्ति मात्र ही एक मात्र तत्त्व है ।४
अन्य मत मतान्तरों की निरर्थकता (Absundity) को सिद्ध करने के उपरान्त
सुख के रूप में चेतना के सातत्य के प्रतिपादकों के मतों का खण्डन करने के उपरान्त ।
आनन्द के कारण ही प्रमा होने के सिद्धान्त, प्रमाता एवं प्रमेयों के बहुत्व के सिद्धान्त,
१-४. स्पन्दनिर्णय ।