स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context१०८ स्पन्दकारिका
ग्राहक = प्रमाता । पुर्यष्टक । शरीर । इन्द्रियाँ आदि । (प्रमाता = Perceiver)
ग्राह्य— १. आन्तर ग्राह्य २. बाह्य ग्राहक
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सुख दुःख राग द्वेषादिक नील पीत आदि ।१
इसके पूर्व के श्लोकों में ग्रन्थकार महोदय समस्त सिद्धान्तों की, अधिकार में न
आ सकने की स्थिति (Untenability) का विवेचन करने के उपरान्त अब स्पन्द तत्त्व
का विवेचन कर रहे हैं । यह स्पन्द तत्त्व ही एक मात्र यथार्थ सत्ता है अन्य नहीं क्योंकि
यह तर्काश्रित है । जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय की सत्ता नहीं है और जहाँ मूढभाव
(अज्ञान या Insentiency) या जीवन्तता का अभाव नहीं है वही वास्तविक रूप में
स्थित तत्त्व है ।२
इस जगत् या जीवन में जो थोड़ा बहुत सुख-दुःख, नील-पीत आदि बाह्य ग्राह्य
एवं पुर्यष्टक, शरीर तथा इन्द्रियाँ आदि ग्राहक हैं वे पारमार्थिक सत्ता नहीं हैं । मैं तर्क के
साथ कह सकता हूँ कि प्रमेय (Perceptible) चाहे वह आन्तरिक हो और चाहे वह
बाह्य हो यथा सुख-दुःखादिक 'आन्तरिक' एवं नील-पीत आदि 'बाह्य' या प्रमाता हो
यथा पुर्यष्टक शरीर एवं इन्द्रियाँ आदि ये प्रामाणिक रूप में अपनी वास्तविक सत्ता नहीं
रखते क्योंकि ये सुषुप्ति की भाँति अनुभूयमान नहीं होते । वे जब भी कभी संचेत्यमान
(अनुभूत) होते हैं तो केवल चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि मेरे दादा गुरु
(Great grand teacher) उत्पलाचार्य ने कहा है कि—३
'प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो ना प्रकाशश्च सिध्यन्ति ।' (ई० प्र० १।५।३) इस प्रकार
कहकर रहस्यतत्त्वविद् 'अस्मत्परमेष्ठी' श्रीमत् उत्पलदेवपाद अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन
करते हैं कि वह वस्तु जो कि प्रकाश में आ सकती है वह प्रकाशक की ही प्रकृति या
स्वभाव की है । जिसमें प्रकाश नहीं है उसकी सत्ता होना भी संभव नहीं है ।
'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः' भी यह प्रमाणित है । इस प्रकार सुख-दुखादि
नीलादिक ग्राह्य एवं उसके ग्राहक जहाँ नहीं हैं । वहाँ प्रकाशैकधनं तत्त्व स्थित है—
'दुःखसुखादि नीलादि तद्ग्राहकं च यत्र नास्ति तत्प्रकाशैकघनं तत्वमस्ति ।'४
शून्यवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज स्पन्द तत्त्व को शून्य तत्त्व से पृथक्
सिद्ध करने हेतु शून्यवाद का खण्डन करते हुए कहते हैं कि—शून्यावस्था (State of
vacuum) भी नहीं है । क्योंकि यथार्थ तत्त्व वह है जहाँ शून्यावस्था (शून्य स्थान) है
ही नहीं ! 'शून्य' (Vacuum) या तो व्यक्त होगा या अव्यक्त । यदि यह व्यक्त नहीं
होता तब यह कैसे कहा जा सकता है कि इसका अस्तित्व है । यदि यह अभिव्यक्त होता
है तो यह अभिव्यक्ति स्वभावात्मक है । अभिव्यक्ति का लोप तो संभव नहीं है क्योंकि
इसकी अनुपस्थिति में—अभिव्यक्ति का अभाव रह नहीं सकता ।५
१-५. स्पन्दनिर्णय ।