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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 186 of 519

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Page 186

प्रथमः निष्यन्दः ८५
द्योतक है । परमात्मा (१) परा (२) अपरा एवं (३) परापरा शक्तियों के रूप में प्रकट
होता है क्योंकि वह जाग्रदादि अवस्थाओं की स्वतन्त्र व्यक्तिगत सत्ता (Individuality)
एवं उसके साथ अपनी अभेदात्मकता व्यक्त करता है । परमात्मा जाग्रदादि अवस्थाओं में
रहता हुआ भी अपने स्वस्वरूप की गवेषणा एवं साक्षात्कार करता रहता है ॥ १
आचार्य रामकण्ठ— 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न,
सुषुप्ति, तुरीय एवं तुरीयातीत आदि विभिन्न अवस्थाओं में तो आत्मा एक रूप रहती ही
है किन्तु अन्य अवस्थाओं में भी वह अविचल, अप्रभावित, अरूपान्तरित, अपरिवर्तित
एवं एक रस तथा एक रूप (समस्वभाव, स्वस्वभाव) रहती है यथा—
१. स्मृत्यावस्था में—'स्मृत्यावस्था अनुभूतविषयासंप्रमोषात्मिका स्वप्न सदृशी,
मनसैव विषयग्रहणसाम्यात् ॥
२. मदावस्था में—'मदः पानातिशयजः चित्तेन्द्रियवृत्ति प्रमोषरूपो विकारः' ।
३. मूर्च्छावस्था में—'मूर्च्छा विषादविषादिभोजनादिजनित मोहात्मा' ।
इसी प्रकार वेद्योँ के ग्रहणाभाव साम्य से सुषुप्ति तुल्य अन्य चेतनावस्थायें भी हैं
वे सभी इन्हीं में अन्तर्भूत हैं । किन्तु इन किसी भी अवस्था में आत्मा क्यों न हो किन्तु
वह अपने नित्यात्मक स्वस्वभाव, स्वस्वरूप का त्याग कभी नहीं करती—'एतन्निमित्तके
विभेदे प्रवर्तमानेऽपि, निजात् उपलब्धुः स्वभावात् असौ न निवर्तते ॥
यदि आत्मा भी अवस्थाओं के साथ अपना रूप, या अपनी अवस्था परिवर्तित कर
देती तो—तब तो अवस्थाओं के साथ वह भी बदल जाती—'तत् अवस्थात् सोऽपि
विभिद्येत, किन्तु ऐसा होता नहीं ।
कारिकाकार ने 'अपि' शब्द का प्रयोग क्यों किया ? रामकण्ठ कहते हैं कि—
एकस्वभाव, समधर्मा रहकर प्रसरण करती है और 'अयं स्वभावात् अवस्था व्यतिरिक्तात्
न निवर्तते इति + अपि शब्दस्य अर्थः'—इसीलिए यहाँ 'अपि' शब्द प्रयुक्त हुआ है ।
'तदभिन्ने' क्यों कहा? अवस्थाता होते हुए भी आत्मा अनेक भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में
अपने स्वभाव से निवर्तित नहीं होती इसीलिए 'तदभिन्ने' (उनसे भिन्न रूप में किन्तु अपने
सत्स्वभाव में अभिन्न रहकर) कहा गया अवस्थाभेदों में भी अवस्थाता अभेदात्मक ही
रहता है । 'स्वभाव' क्या है? 'स्वस्वभाव एव शङ्कर इति सम्यक् उपपादितं स्वानुभावा-
नपह्नविनः प्रबुद्धान प्रति ।'
अवस्थात्रय में भी एकत्व
द्वितीय कारिका में आन्तर एवं बाह्य दोनों अवस्थाओं में एक ही स्वभाव
(स्पन्दतत्त्व) की व्याप्ति का प्रतिपादन किया गया था ।
समस्त भेदों में भी अभेद—
प्रश्न--जब जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भिन्नता है फिर
सभी में स्वभावगत एकता को कैसे स्वीकार किया जा सकता है?
१. स्पन्दनिर्णय ।