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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 118 of 519

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Page 118

प्रथमः निष्यन्दः १७
स्पन्द तत्त्व के विभिन्न पक्ष एवं स्वरूप
[ शिव तत्त्व ] [ विमर्शात्मिका शक्ति स्वात्मोच्छलन नित्य कम्पनशीलता ] [ अनुत्तर तत्त्व की सृष्टि हेतु सकलात्मक चलता, गतिमयता, (स्फुरण) ] [ शिव का 'अहं प्रत्यविमर्श' = 'पूर्ण अहं विमर्श' ] [ किंचित् चलता सिसृक्षा की दिशा में संकल्पात्मक स्फुरण या उन्मुखता ] [ संवित् के समुद्र की तरंग अहं विमर्शात्मक स्फुरण ]
स्पन्दनं—निस्तरंगस्यास्य तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्य-
वृत्तिता ॥—उत्पलाचार्य ।
यत् परापरभूपस्पर्शि यत्संकल्पाल्ल्योदयौ ।
स्पन्दसंज्ञं झरूपं तत् शक्तीशं स्वलं नुमः ॥ —उत्पलाचार्य ।
१. अनुत्तर मूर्ति शिव में, अपनी इच्छाशक्ति द्वारा, जगत् का सृजन करने की जो
इच्छा उत्पन्न होती है उससे समुत्पन्न कम्पन ही 'स्पन्द' है—
'यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम् ।
पस्पन्दे स स्पन्दः .... .... .... ॥ (ष०ल०सं०)
शिव के सिसृक्षा का संकल्पात्मक कम्पन = 'स्पन्द' है।
निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही
किंचित् चलन है। 'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से 'स्पन्द' शब्द निष्पन्न हुआ है। 'स्पन्द
शक्ति' उच्छलनात्मक है।
२. 'स्पन्दकारिका'—'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र 'स्पन्दः' प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
३. 'स्पन्द' और 'निष्यन्द'—सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण, महत्तत्व, अहंकार
के जो स्पन्द हैं उन्हीं के निष्यन्द (प्रवाह) हैं—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगे ।
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ॥ १९ ॥
४. भट्टकल्लट—अत्यन्त क्रोधी होने, हर्षित होने, अकस्मात् दौड़ पड़ने,
अकस्मात् 'मैं क्या करूँ?' इस प्रकार की चिन्ता में पड़ जाने पर जब किसी व्यक्ति के
अन्तस् में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उदय हो जाता है तब उस क्षणिक अवधान में स्पन्द
तत्त्व का स्पष्ट रूप में उदय हो जाता है—
'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्घे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि इत्येवं चिन्ता-
विशिष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो ।'
१. परतत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप में नित्यावस्थित शक्ति ही—'स्पन्द
शक्ति' है ।
२. अहं विमर्शात्मिका शक्ति ही स्पन्द है ।
स्पं० २