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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 117

१६ स्पन्दकारिका
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' । (का० १९)
१. प्रतिष्ठित स्पन्द २. अप्रतिष्ठित स्पन्द ॥ (प्रतिष्ठित स्पन्द सामान्य, अप्र० =
विशेष) ।
(क) अप्रतिष्ठित स्पन्द—एकत्व में अवभासित अनन्त वैचित्र्यात्मक पदार्थ एवं
पदार्थाक जगत् ॥ (माया तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व पर्यन्त प्रसृत ।)
एकत्व से निःसृत अनेकत्व ।
'सामान्य स्पन्द' प्रतिष्ठित एवं 'विशेष स्पन्द' 'अप्रतिष्ठित स्पन्द' कहलाते हैं।
नानात्मक विश्ववैचित्य में जो एकता की इकाई है वही सामान्य स्पन्द है। 'गुणादिस्पन्द'
= 'विशेष स्पन्द' हैं। 'सामान्य स्पन्द' से विशेष स्पन्द = गुणादि स्पन्द का प्रादुर्भाव ॥
'स्पन्दनिष्यन्द' क्या हैं? नानारूपात्मक एवं प्रवहमान स्पन्द धारायें ही स्पन्द के निष्यन्द
हैं। 'स्पन्द' समुद्र है और निष्यन्द उसकी अनन्त ऊर्मियाँ हैं। जड़चेतन विश्व का प्रत्येक
पदार्थ एक सर्वव्यापी एवं नित्य स्पन्दशक्ति का एक प्रवाह है। शाश्वतस्पन्दनशीला-
पारमेश्वरी सामान्यस्पन्द का रत्नाकरविशेष स्पन्दों के निष्यन्द (या स्पन्द-प्रवाह) गुणत्रय
के स्पन्दों के असंख्य प्रवाहों का मूल सामान्यस्पन्द है। (का० १९)।
विशेष स्पन्द—प्रतिक्षण पशुओं के अन्तस् में विद्यमान चिन्मात्रता पर आवरण
डालते रहते हैं (का० २०)। भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते रहना स्पन्द शक्ति का स्व-
भाव है। विश्व के सारे रूप शक्ति या स्पन्द के ही रूप हैं। शक्ति की सामान्यभूमिका
(पशुपति की दशा में)—चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया।
शक्ति की पशुदशा—(विशेष भूमिका) : अन्तःकरण, इन्द्रियाँ, एवं अनन्त
प्रमेयों के रूप में प्रवाहित। स्वातंत्र्य शक्ति—प्रपञ्च। एक ही पारमेश्वरी स्पन्द शक्ति है
किन्तु स्वातंत्र्यशक्ति के द्वारा इच्छा, ज्ञान, क्रिया एवं अनन्त प्रमेयों, प्रमाताओं के रूप में
तथा विराट् प्रपञ्च के रूप में प्रवहमान है। 'स्पन्द' किंचित् चलन = स्वतन्त्ररूप में
निरपेक्ष स्फुरण। स्पन्द या स्फुरण न हो तो सब कुछ जड़ हो जाय। विमर्शात्मक स्फुरण
ही सब का मूल केन्द्र है।
विमर्शात्मक स्पन्द के प्रसार के भेद
'स्पन्द तत्त्व' की अवस्थायें स्पन्द के दो रूप
स्पन्दतत्त्व
[ कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, वेदक ] [ कार्य, भोग्य, दृश्य, वेद्य ] [ सामान्य स्पन्द प्रतिष्ठित स्पन्द ] [ विशेष स्पन्द अप्रतिष्ठित स्पन्द ]
स्पन्द शक्ति की द्विमुखी गतिमयता
अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द