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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

Page 173 of 190

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Page 173

CC-0.In Public न्मेश्वरान् की उपलब्धि by eGangotri १६३
[ गुरुभारती की वन्दना ]
अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ।
वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥५२॥
अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥५२॥
अनुवाद
सूत्र— मैं उस, विचित्र शब्दों और अर्थों से युक्त एवं अतीव अद्भुत, गुरु-वाणी की
वन्दना करता हूँ जो कि गहरे और अपार संशय-सागर के पार उतारने वाली नैया
है ॥५२॥
वृत्ति—अगाध अर्थात् स्वतः निराधार होने पर भी, अंतहीन ॥५२॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में वृत्तिकार ने 'अगाध' शब्द के 'अप्रतिष्ठ' और 'अनन्त' ये पर्याय देकर
यह आशय अभिव्यक्त किया है कि वास्तव में संशय नामक किसी वस्तु का सद्भाव ही नहीं
है। कारण यह कि अज्ञान ही दूसरे शब्दों में संशय है और गुरु-कृपा से मन में शुद्ध-विद्या
का उदय होते ही सारे संशय स्वयं निवृत्त हो जाते हैं। पशु-भूमिका पर जब तक मन में
सद्-ज्ञान का उदय न हो तब तक ही संशय सागर का अन्तहीन विस्तार मानवों को दिग्भ्रम में
डाल देता है। फलतः इसकी अन्तहीनता केवल तथाकथित है, वास्तविक नहीं।
ऐसा लगता है कि वृत्तिकार को 'अगाध' शब्द से ऐसे दो अर्थ लिखने की प्रेरणा
इसके दो प्रकार के विग्रहों से मिली है जैसा कि निम्नलिखित पंक्तियों में स्पष्ट किया जा
रहा है।
१. अगाध— (न अस्ति गाधो विश्रान्ति-भूमिका यस्य ) जिसकी अपनी कोई
आधारभूत टिकान नहीं है।
२. अगाध— (न अस्ति गाधो विश्रान्ति-भूमिका यस्मिन्) जिसमें कहीं भी दम भरने
के लिये कूल-किनारा नहीं है।
ऐसे दुष्पार संशय-सागर को पार करने के प्रति उत्सुक व्यक्तियों के लिये, सारे
अभिमानों को छोड़ कर, केवल सद्-गुरुओं के चरण-कमलों की सेवा करना प्रथम कर्त्तव्य है।
इति श्रीभट्टकल्लट विरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ
'विभूतिस्पन्दः' तृतीयो निःष्यन्दः ॥
श्रीमान् भट्टकल्लट के द्वारा विरचित स्पन्दकारिका वृत्ति का
'विभूति-स्पन्द' नामक तीसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ।

१. ईश्वर आश्रम ( इशबर कश्मीर ) में पढ़ी जाने वाली गुरुस्तुति । रचना वाराणसीय
श्रीरामेश्वर...