स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१५४ स्पन्दकारिका
तन्मात्रगोचरः—१३. प्रकृति-तत्त्व। २५. पायु-तत्त्व।
१४. बुद्धि-तत्त्व। २६. उपस्थ-तत्त्व।
१५. मनस्-तत्त्व। २७. शब्द-तत्त्व।
१६. अहंकार-तत्त्व। २८. स्पर्श-तत्त्व।
१७. श्रोत्र-तत्त्व। २९. रूप-तत्त्व।
१८. त्वक्-तत्त्व। ३०. रस-तत्त्व।
१९. नेत्र-तत्त्व। ३१. गन्ध-तत्त्व।
२०. जिह्वा-तत्त्व। ३२. आकाश-तत्त्व।
२१. घ्राण-तत्त्व। ३३. वायु-तत्त्व।
२२. वाणी-तत्त्व। ३४. तेजस्-तत्त्व।
२३. हस्त-तत्त्व। ३५. जल-तत्त्व।
२४. पाद-तत्त्व। ३६. पृथिवी-तत्त्व।
सूत्र ४७—
इस सूत्र में शक्ति के 'स्वरूप-आवरणात्मक' स्वभाव का वर्णन किया गया है। पहले
भी इस तथ्य को समझाने का प्रयत्न किया गया है कि स्वरूप पर प्रतिसमय किसी न किसी
प्रकार का आवरण डालकर, उसको आड़ में कर देना शक्ति का अकाट्य स्वभाव है। इस
सम्बन्ध में यह दृष्टि में रखना आवश्यक है कि शिवभूमिका पर शक्ति का रूप अहंविमर्शमयी
स्पन्दना अथवा पूर्णस्वातन्त्र्य है अतः उस भूमिका पर स्वरूपगोपन का प्रश्न ही नहीं उठता
है। परन्तु ज्यों ही शक्ति बहिर्मुख होकर मायाशक्ति का रूप धारण करती है त्यों ही इसकी
स्वरूपगोपनात्मक प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। यही कारण है कि मायाशक्ति को शास्त्रों
में, 'स्वरूपगोपन-व्यग्रा', अर्थात् स्वरूप को तिरोहित करने में व्यस्त, की संज्ञा दी गई है।
स्वरूप आवरण को ही दूसरे शब्दों में मायीय-मल कहा जाता है, क्योंकि मायीय
आवरणों के द्वारा आवृत होने के कारण से ही, शिव, अपने ही अङ्गभूत वेद्य पदार्थों को,
स्वरूप से भिन्न समझने के संकोच की परवशता में पड़ जाता है।
इसके अतिरिक्त इसी सूत्र में उल्लिखित 'शब्दानुवेध' के विषय में यह समझना
आवश्यक है कि संसार के प्रत्येक अर्थ के साथ उसके वाचकभूत शब्द का, नीर-क्षीर का जैसा
संश्लेष शाश्वतरूप में वर्तमान है। शास्त्रीय शब्दों में इस प्रकार कहा जाता है कि प्रत्येक
अर्थ (ज्ञेयविषय) प्रकाशरूप है और उसका वाचक शब्द उसके अणु-अणु में व्याप्त रहनेवाली
विमर्शना है। शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में सत्ता प्रदान कर देता है। क्योंकि
संसार में किसी ऐसे अर्थ या उसके ज्ञान का सद्भाव ही नहीं है जिसके साथ शब्द अर्थात्
अभिलापात्मकता न हो। फलतः शब्द और अर्थ का साहचर्य साक्षात् शिव-शक्ति का
संघटन ही है।