स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
Page 142 of 190
Read in context१३२ स्पन्दकारिका
विषयों या घटनाओं का ऐसा स्वतःसिद्ध ज्ञान हो जाता है कि मानो वह उनका प्रत्यक्ष
साक्षात्कार कर रहा हो। इन दो सूत्रों में से पहला दृष्टान्त और दूसरा दाष्टान्तिक हैः—
यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ।
भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥३६॥
यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव
स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य ॥३६॥
तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथा स्थितम् ।
तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् संप्रवर्तते ॥३७॥
तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र देशे,
यथा येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा स्वबलं स्वस्वरूपमाश्रितस्याचिरेणैव
कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतानागतं ज्ञानं परिमितविषयं न
किञ्चिदाश्चर्यम् ॥३७॥
अनुवाद
सूत्र—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने
पर भी, पहली नज़र में स्पष्टरूप में दिखाई नहीं देता है, परन्तु तत्काल ही आत्मबल का
प्रयोग करके देखे जाने पर, उसको, वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दिखने लगता है ॥३६॥
उसी प्रकार योगी को, स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की दशा में, थोड़े समय
में ही वे सारे पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में वर्तमान हों, ठीक
उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥३७॥
वृत्ति—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, सावधानता से देखे जाने
पर भी, पहले स्पष्टरूप मे परिलक्षित नहीं होता है, परन्तु अनन्तर उसी स्थान पर खड़ा रहते
हुये ही, विशेष प्रयत्न के द्वारा देखे जाने पर उसको, वही पदार्थ बिलकुल स्पष्टरूप में दिखाई
देता है उसी प्रकार स्पन्दात्मक स्वरूप में अवस्थित योगी को, वैसा ही विशेष प्रकार का
प्रयत्न काम में लाने पर, थोड़े समय में, सारे पदार्थों के ठीक उसी रूप का बोध हो जाता
है जिस रूप में वे जिस किसी देश, जिस किसी काल और जिस किसी आकार-प्रकार में
वर्तमान हों। इसका कारण केवल यही है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण
हटा हुआ होता है फलतः योगियों के लिये अतीत एवं अनागत पदार्थों का सही रूप में
बोध होना एक छोटी सी बात है। इसको कोई महान् आश्चर्य समझने की आवश्यकता
नहीं है ॥३६-३७॥
विवरण
शैवशास्त्रियों का विचार है कि साधारण जीवन व्यवहार में भी जिस समय किसी प्राणी
को, अपने नेत्रों और इसलिये ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा स्पष्टतर रूप में ग्रहण किये जाने के