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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२९
अभ्यर्थना को कभी भी नहीं टालता है । ऐसे योगी के मध्य अर्थात् सुषुम्णाधाम में प्रतिसमय
हृदय अर्थात् चित्-शक्ति की अनुभूति स्फुटतर रूप में विद्यमान रहती है । इस अवस्था
को (पारिभाषिक शब्दों में) 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं । इसका अभिप्राय यह कि 'स्वप्न-
स्वातन्त्र्य' की अवस्था ही इस बात की सूचिका होती है कि योगी के हृदय पर विद्यमान
तामसिक आवरण फट गया है ॥३४॥
इसके विपरीत—
वृत्ति—यदि योगी स्वस्वरूप में पूर्णतया अवस्थित रहने में सावधानी न बरते तो उसके
लिये स्वप्न-अवस्था में ऊल-जलूल भावों की ही सृष्टि स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है। इसका
कारण यह है कि स्पन्द-शक्ति प्रसवधर्मा है अर्थात् उत्तरोत्तर भावों की सर्जना करते
रहना उसका स्वभाव है। असावधान योगी को, जाग्रत् और स्वप्न दोनों अवस्थाओं
में, आम लौकिक प्राणियों की तरह, ऊटपटाङ्ग विकल्पों का ही साक्षात्कार होता रहता
है ॥३५॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों के व्याख्यान में, स्पन्द-सूत्रों के प्राचीन टीकाकारों में मतैक्य नहीं पाया
जाता है। वास्तव में इन सूत्रों की शब्दावलि के प्रयोग का ढंग ही कुछ इस प्रकार का है कि
किसी भी व्याख्याकार के मन में, सूत्रों के अर्थ के विषय में, अनेक शंकायें उत्पन्न हो सकती
हैं। अस्तु इन टीकाकारों के पारस्परिक मतभेद के झमेले में पड़ना प्रस्तुत प्रयास का लक्ष्य
नहीं है। यहाँ पर केवल इतना ही समझना पर्याप्त है कि प्रस्तुत संदर्भ में हमारे वृत्तिकार
भट्टकल्लट का दृष्टिकोण क्या रहा है ?
भट्टकल्लट की वृत्ति का सूक्ष्म अध्ययन और गम्भीर मनन करने के उपरान्त, पाठक
सहज ही में इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि मूल सूत्रकार ने प्रस्तुत सूत्रों में, योगियों को,
आध्यात्मिक योग्यता के आधार पर 'अपरिपक्व', 'परिपक्व' और 'असावधान' इन तीन
श्रेणियों में बांट दिया है। इस अभिप्राय को अभिव्यक्त करने के लिये, उसने पहले सूत्र में
'जाग्रतो देहिनः', दूसरे में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' और तीसरे में 'अन्यथा' शब्दों का
प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त इन तीन सूत्रों में, तीनों प्रकार के योगियों की संकल्पशक्ति
की व्यापकता की परिधि भी निश्चित की है। सूत्रकार के इस सारे अभिप्राय को वृत्ति में इस
प्रकार स्पष्ट किया गया है—
१. पहले सूत्र में उल्लिखित 'जाग्रतो देहिनः' शब्दों का अर्थ वृत्ति में 'अनभिव्यक्त-
स्वरूपस्य योगिनः' इस प्रकार लगाया गया है। इसका अभिप्राय यह कि प्रस्तुत प्रकरण में
जाग्रतो देहिनः' इन शब्दों से संसार के सर्वसाधारण देहधारियों का नहीं, अपितु ऐसे योगियों
का अभिप्राय है जो जाग्रत् अर्थात् अभ्यास के विषय में सावधान तो रहते हों परन्तु अभी
'देहाभिमान के पूर्णतया गल न पाने के कारण स्वरूप पर अवस्थित भी न हों। इस स्तर के
योगियों को अपरिपक्व योगियों के वर्ग में रखा जा सकता है।
१. द्रष्टव्य—शिवसूत्र १.१९ की १५७वीं टिप्पणी ।
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