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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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१२० स्पन्दकारिका
स्थित रहता है। आत्मसत्ता चाहे शिवभाव पर अवस्थित हो या पशुभाव पर, स्वभावतः
वेदक सत्ता है क्योंकि ज्ञान-क्रियामयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। सारे वेद्य पदार्थों
का अस्तित्व या अनस्तित्व मौलिक वेदक-सत्ता पर ही निर्भर है क्योंकि वही चेतन होने के
कारण अपने स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उनको १ सत्ता प्रदान करती है। फलतः विशेष आकार-
प्रकार वाला और सिर पैर इत्यादि अङ्गों की सहकारिता से उपलक्षित, पाञ्चभौतिक शरीर
ही जीवात्मा का मात्र २ शरीर नहीं होता है अपितु उससे इतर जिन जिन पदार्थों के साथ
उसकी संवेदनात्मक एकाकारता होती रहती है, उन उन में संवेदन के ही रूप में अनुप्रविष्ट
होकर, उनको अपना शरीर बनाता रहता है। अतः इस दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि पर यदि
दृढ़ अनुसंधान किया जाये तो स्वयं यह तथ्य अनुभव में आ जाता है कि जीवात्मा भी वास्तव
में विश्वशरीरी (सर्वमय) है।
संसार के सारे संवेद्य विषय, जिनको जीवात्मा संवेदन के द्वारा शरीर रूप में स्वीकारता
या नकारता रहता है, दो प्रकार के हैं—'भूतात्मक विषय' और 'भावात्मक विषय'। इनकी
परिभाषा इस प्रकार है—
१. भूतात्मक विषय—वे विषय, जो पाँच महाभूतों के मिश्रण से बने हुए, विचित्र एवं
अनेक आकार-प्रकारों वाले, बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य, निश्चत सिर, पैर, हाथ इत्यादि अङ्गों से
युक्त और स्थूल हैं। इनमें प्रत्येक प्रकार के स्थूल शरीर अन्तर्भूत हो जाते हैं।
२. भावात्मक विषय—वे विषय, जिनका कोई अङ्गों और उपाङ्गों वाला और
स्थूल आकार-प्रकार वाला मूर्त शरीर नहीं है और केवल संवेदनात्मक अनुभूति से ही
गम्य हैं, इनमें सुख, दुःख, धर्म, अधर्म इत्यादि अनन्त प्रकार के विषय अन्तर्भूत हो
जाते हैं।
इसके अतिरिक्त संवेद्य विषयों के और भी दो रूप होते हैं 'भावरूप विषय' और
'अभावरूप विषय'।
भावरूप विषय—वे विषय, जिनका संसार में भावरूप में अस्तित्व विद्यमान है जैसे
घट, पट, सुख, दुःख, इत्यादि।
अभावरूप विषय—वे विषय, जिसका अस्तित्व तो है परन्तु अभावरूप में जैसे—
आकाशपुष्प, खरगोश के सींग, बांझ का बेटा, साप के कान इत्यादि।
ऊपर की यह विभागकल्पना मात्र औपचारिक है क्योंकि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के
विषय की स्थिति में कोई अन्तर नहीं है। संवेदन में मूर्त घट की जैसी अनुभूति होती है वैसी
ही अमूर्त सुख-दुःखादि की भी। दूसरी बात यह है कि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के विषय की
१. यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये ।
वेदकं वेद्यमेकं तु...................॥
(उ० भै०, शिवसूत्र १.१ में उदाहृत)
२. एवञ्च यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते, न तु नियतशिरःपाण्याद्यव-
यवसंनिवेश एव । (स्प० का० वि०, ३.३)