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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११७
अखण्डरूप में प्रतिबिम्बित हो जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने लिये पूर्वोक्त
'विकल्पसंस्कार' की युक्ति ही सरलतम हो उपाय है क्योंकि इसमें अन्य उपायों के लिये आवश्यक
दुरूह शास्त्रीय विधि-विधानों का पालन करने की माथापच्ची का टंटा नहीं होता है। पहले
भी कहा गया है कि उत्सुक व्यक्ति दैनिक आदान-प्रदान करता हुआ भी, अपने मानसिक
संतुलन पर दृढ नियन्त्रण रखकर, धीरे धीरे सद्धिमर्श के द्वारा चित्त से कुत्सित विकल्पों का
बहिष्कार कर सकता है। विकल्पों का संस्कार करने से भावनायें निर्मल हो जाती हैं और
परिणामतः मनमें स्वयं ही शुद्धविद्या का उदय हो जाता है। सावक को, मन में शुद्धविद्या के
स्वर्णिम आलोक का उदय होते ही, मन्त्रशक्ति की अनुभूति हो जाती है।
इस सम्बन्ध में भगवान् १अभिनवगुप्त ने अपने ग्रन्थ तन्त्रालोक में भावनाओं की
स्वच्छता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने इस महान् ग्रंथ में एक स्थान पर श्री-मालिनी-
विजय के प्रमाणवाक्य को उद्धृत करके 'तदाक्रम्य' इत्यादि प्रस्तुत सूत्रों का यही अभिप्राय
निकाला है कि आत्मोद्धार करने के दुर्गम मार्ग को पार करने के लिये भावनाओं की निर्मलता
से बढ़कर और कोई भी सहायक सामग्री उपयुक्त नहीं बन सकती है। फलतः मन्त्रवीर्य की
अनुभूति प्राप्त करने का सरलतम और प्रभावोत्पादक उपाय 'विकल्प संस्कार' ही है।
अभी ऊपर जिस शुद्धविद्या का उल्लेख किया गया है उसके सम्बन्ध में यहाँ पर थोड़ा
सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। छत्तीस तत्त्वों में ईश्वरतत्त्व से नीचे और मायातत्त्व से ऊपर
एक अन्तरालवर्ती तत्त्व है। उसको 'शुद्धविद्या-तत्त्व' कहते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में शुद्धविद्या
शब्द से उसका अभिप्राय नहीं है, अपितु यहाँ पर यह शब्द उसी पूर्वोक्त शुद्धविमर्श का
द्योतक है जिसके उदय में आते ही योगी के हृदय में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता इत्यादि छः माहेश्वर
धर्म स्वयं ही निखर उठते हैं। शैवशास्त्रियों ने, प्रस्तुत २'विद्या' शब्द की व्युत्पत्ति लाभार्थक
'विद्लृ' धातु, विचारार्थक 'विद्' धातु और ज्ञानार्थक 'विद्' धातु इन तीन धातुओं से मानकर,
इसका निर्वचन निम्नलिखित तीन प्रकार से किया है।
१. विद्या (लाभार्थक 'विद्लृ' धातु)—विमर्श की वह उच्चत्तम भूमिका जिसके
विकसित हो जाने पर, योगी को सर्वज्ञता इत्यादि शिवधर्मों का लाभ सहज ही में हो
जाता है।
१. नियतिप्राणतायोगात् सामग्रीतस्तु यद्यपि।
सिद्धयो भाववैमल्यं तथापि निखिलोत्तम् ॥
उक्तं श्रीसारशास्त्रे च निर्विकल्पो हि सिद्ध्यति ।
क्लिश्यन्ते सविकल्पास्तु कल्पोक्तेऽपि कृते सति ॥
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा'—'अयमेवोदयः स्फुटः' ।
इत्यादिभिः स्पन्दवाक्यैरैतदेव निरूपितम् ॥—(तं०, ३.११०-१४)
२. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दोद्योत (४. ३९५-९६)