सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
अच्युतग्रन्थमालायाः ( ख ) विभागे षष्ठं प्रसूनम्
श्रीमदप्पय्यदीक्षितविरचितः
सिद्धान्तलेशसंग्रह
वेदान्ताचार्यपं०श्रीमूलशङ्करव्यासविरचितेन सटिप्पणभाषानुवादेन
समलङ्कृतः
श्रीजो०ग०गोयनका-संस्कृतमहाविद्यालयाध्यक्षेण पं०श्रीचण्डीप्रसादशुक्लशास्त्रिणा
अच्युतग्रन्थमालाध्यक्षेण पं० श्रीश्रीकृष्णपन्तशास्त्रिसाहित्याचार्येण च
सम्पादितः ।
प्रकाशनस्थानम्—
अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालयः, काशी।
संवत्
प्रथमावृत्तिः ] १९९३
प्रकाशक—
श्रेष्ठिप्रवर श्रीगौरीशङ्कर गोयनका
अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालय, काशी ।
मुद्रक
ना० रा० सोमण
श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस, बनारस ।
'भूमिका'
—•—
कुछ लिखनेके पहले उन श्रद्धेय महानुभावोंको मैं कदापि नहीं भूल सकता हूँ, जिन्होंने इस ग्रन्थके अनुवादकी आशातीत सफलताके लिए अनेक कष्टोंको सहकर परिश्रम किया है और उपयोगी सलाह देते रहे हैं। यदि उनकी सलाह न होती तो ऐसे क्लिष्ट ग्रन्थका अनुवाद होना प्रायः असम्भव ही था;. वे महानुभाव हैं—श्रद्धेय वयोवृद्ध पू० पं० चण्डिप्रसाद शुक्लजी और मान्यवर श्रद्धेय पं० श्रीकृष्ण पन्तजी ।
सिद्धान्तलेशसंग्रहके प्रणेता पण्डित अप्पय्यदीक्षित उन महान् पण्डितोंमें थे, जिनका नाम आज तक विद्वत्समुदायमें बड़े गौरव और श्रद्धासे लिया जाता है, इन्होंने अपनी लेखनीसे ऐसे-ऐसे अनेक ग्रन्थ लिख डाले हैं, जिन्हें देखकर सरस विद्वानोंका मस्तक अपने-आप उनके चरणोंमें झुक जाता है ।
इतिहासज्ञोंने ई० १५२० से १५९३ तक इनका जीवनकाल निश्चित * किया है। पं० अप्पय्यदीक्षितका जन्म काञ्चीके आस-पास 'अडप्पल्ल' गाँवमें हुआ था, अभी तक उनके कुछ वंशज उस प्रान्तमें विद्यमान हैं। अप्पय्य-दीक्षितके पितामहका नाम आचार्यदीक्षित था, क्योंकि उन्होंने न्यायरक्षामणि ग्रन्थमें † पितामहका नामग्रहण करके नमस्कार किया है । इनका
* यद्यपि इस विषयमें कुछ मतभेद है अर्थात् कुछ लोग १५५०—१६२२ तक इनकी स्थितिका काल मानते हैं, तथापि तत्सम्बन्धी विचार पुरुषार्थचतुष्टयान्यतमोत्पादक न होनेके कारण प्रकृतमें अनावश्यक-सा है। और ऐतिहासिक लोग अन्य ग्रन्थोंसे भी इसका अवधारण कर सकते हैं । इसलिए मैं इसपर अधिक लिखना पसन्द नहीं करता ।
† 'आसेतुबन्धतटमा च तुषारशैलादाचार्यदीक्षित इति प्रथिताभिधानम् ।
अद्वैतचिन्तामृताम्बुधिमग्नभावमस्मत्पितामहमशेषगुरुं प्रपद्ये ॥'
इस प्रकारका श्लोक न्यायरक्षामणिमें उपलब्ध होता है ।
[ २ ]
वक्षःस्थलाचार्य भी दूसरा * नाम था । ये अपने समयके प्रौढ़ विद्वान् और दानी थे । उन्होंने बड़े-बड़े अनेक यज्ञ किये थे ।
अप्पय्यदीक्षितके पिताका नाम 'रङ्गराजाध्वरी' था । ये भी अनेक शास्त्रोंमें अप्रतिम पण्डित थे । अप्पय्यदीक्षितने इन्हींसे सब शास्त्र पढ़े थे, इस विषयका स्वयं दीक्षितजीने ही अनेक स्थानोंमें स्पष्टीकरण किया है † ।
अनेक प्रमाणोंसे दीक्षितजीका नाम 'अप्प' दीक्षित ही मालूम होता है, परन्तु आन्ध्र, कर्णाटक आदि देशोंकी भाषासरणिसे इनके 'अप्पय या अप्पय्य' ऐसे भिन्न नाम भी व्यवहारमें प्रचलित हैं । ये विजयनगरके अधीश्वर चिन्न बोम्म, नरसिंहदेव और वेंकटपतिरावके समकालिक थे, इसमें ‡ अनेक प्रमाण मिलते हैं । सिद्धान्तकौमुदीके विख्यात रचयिता भट्टोजीदीक्षितने भी सिद्धान्त-कौमुदीकी रचनाके बाद दक्षिणमें जाकर अप्पय दीक्षितजीसे पढ़ा था, उसके बाद उन्होंने तत्त्वकौस्तुभनामक ग्रन्थ लिखा था, जिसमें अपने गुरु अप्पयदीक्षितको ही प्रणाम किया है ।
अप्पयदीक्षितने अपने जीवनकालमें सौसे अधिक ग्रन्थ लिखे थे, ऐसा प्रमाण मिलता है, × क्योंकि उनके नामके आगे 'चतुरधिकशतप्रबन्धनिर्वाहका-
* यहाँपर चित्रमीमांसाका कुछ अंश प्रमाणरूपसे उद्धृत करते हैं—यथास्मत्कुलकूटस्थ-वक्षस्थलाचार्यविरचितवरदराजवसन्तोत्सवे—
'काञ्चित् काञ्चनगौराङ्गीं वीक्ष्य साक्षादिव श्रियम् ।
वरदः संशयापन्नो वक्षःस्थलमवेक्षते ॥'
† इसी ग्रन्थके 'तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान्' 'विद्वद्गुरोर्विदितविश्वजिदध्वरस्य' इत्यादि पद्य इसमें प्रमाण हैं ।
‡ इस विषयमें ये प्रमाण मिलते हैं—
हेमाभिषेकसमये परितो निषण्णसौवर्णसंहतिमिषाच्चिन्नबोम्मभूपः ।
अप्पय्यदीक्षितमणेरनवाद्यविद्याकल्पद्रुमस्य कुरुते कनकालवालम् ॥१॥
द्विर्भावः पुष्पकेतोर्विधुघटितदृशां पौनरुक्त्यं विकल्पश्चिन्तारत्नस्य वीप्सा
तपनतनुभवो वासवस्य द्विरुक्तिः । द्वैतं देवस्य दैत्याधिपमथनकलाकेलि-
कारस्य कुर्वन्नानन्दं कोविदानां जगति विजयते श्रीनृसिंहः क्षितीन्द्रः ॥२॥
अमुं कुवलयानन्दमकरोदप्पदीक्षितः ।
नियोगतो व्यङ्कटपतेर्निरुपाधिकृपानिधेः ॥३॥
ये तीनों पद्य क्रमशः समरपुङ्गवदीक्षितके यात्राप्रबन्धमें, अप्पयदीक्षितविरचित चित्रमीमांसामें और कुवलयानन्दमें मिलते हैं ।
× यद्यपि अप्पय्यदीक्षितके सभी ग्रन्थोंके नाम ज्ञात नहीं हो सके हैं। गुरुपरम्परा एवं अन्यान्य ग्रन्थोंसे जितने नाम हमें उपलब्ध हो सके हैं, उनका निम्न प्रकारसे उल्लेख किया है—
[ ३ ]
चार्य' अर्थात् एक सौ चार ग्रन्थोंके निर्माण करनेवाले आचार्य, यह उपाधि लगी हुई कहीं-कहींपर मिलती है ।
अस्तु जो कुछ हो, परन्तु इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है कि दीक्षित-जीका सब शास्त्रोंमें अप्रतिहत पाण्डित्य और उनकी प्रतिपादनशैली विलक्षण ही थी । ये परम आस्तिक थे । इनका गोत्र भारद्वाज था । ये * ७२ वर्षकी दीर्घ आयु तक जीवित रहे । शायद इतनी बड़ी आयुवाले पण्डित संसारमें अल्प ही हुए हैं ।
इतिहासप्रेमियोंके लिए इतनी ही सामग्री छोड़कर अब अन्य प्रकृतो-पयोगी विचार करते हैं—
सिद्धान्तलेशसंग्रह वेदान्तदर्शनका एक बड़ा उपयोगी ग्रन्थ है, क्योंकि इसके यथावत् अध्ययन करनेपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका ऐसा कोई भी मत अज्ञात नहीं रह जाता है, जो इसमें न आया हो । इस ग्रन्थमें ग्रन्थकारने जिन-जिन मतोंका सङ्ग्रह किया है, उनका आगे जाकर दिग्दर्शन करायेंगे । इसके पहले यह बतलानेकी चेष्टा करते हैं कि दर्शनशब्दका क्या अर्थ है, वे कितने हैं, और उनकी क्या आवश्यकता है ।
यद्यपि दर्शनशब्दके प्रकरणानुसार अनेक अर्थ होते हैं, और उनका कोषोंमें निरूपण भी मिलता है †, तथापि जहां शास्त्रशब्दके ‡ साथ दर्शनशब्द आता
कुवलयानन्द, चित्रमीमांसा, वृत्तिवार्तिक, नामसंग्रहरत्नमाला, और इसकी व्याख्या, नक्षत्रवादावली, प्राकृतचन्द्रिका, चित्रपुट, विधिरसायन, सुखोपयोजनी, उपक्रमपराक्रम, परिमल, न्यायरक्षामणि, सिद्धान्तलेशसंग्रह, मतसारार्थसंग्रह, नयमञ्जरी, न्यायमुक्तावली, नयमयूखमालिका, शिवार्चनमणिदीपिका, मणिमालिका, रत्नत्रयपरीक्षा, शिखरिणीमाला, शिवतत्त्वविवेक, ब्रह्मतर्कस्तव, शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतनिर्णय, शिवार्चनचन्द्रिका, बालचन्द्रिका, शिवध्यानपद्धति, आदित्यस्तवरत्न, मध्वतन्त्रमुखमर्दन और मध्वमतविध्वंसन आदि ।
* इस विषयमें दीक्षितजीके भ्राताके पुत्र नीलकण्ठ द्वारा विरचित शिवलीलाणर्वके प्रथम सर्गमें एक श्लोक प्रमाणरूपसे मिलता है—
फुल्लेन शम्भुः किल तावताऽपि कलाश्चतुष्षष्टिमताः प्रणिन्थे ।
द्वासप्ततिं प्राप्य समाः प्रबन्धाञ्छतं व्यधादप्पयदीक्षितेन्दुः ॥
और इसी प्रमाणसे दीक्षितजीने सौ ग्रन्थ बनाये हैं, यह भी साबित होता है ।
† जैसे नेत्र, स्वप्न, बुद्धि, धर्म, दर्पण आदि ।
‡ शास्त्रशब्दका लक्षण यों मिलता है—प्रवृत्तिन्न निवृत्तिन्न नित्येन कृतकेन वा । पुंसां
[ ४ ]
है, वहाँ पर उसका अर्थ होता है—दृश्यते—यथार्थरूपतया ज्ञायते अलौकि-
कार्थो येन, इस व्युत्पत्तिसे ठीक-ठीकरूपसे अलौकिक अर्थका (लौकिकचक्षु
आदि प्रमाणोंसे ज्ञात नहीं होनेवाले अर्थका) परिज्ञान जिससे होता हो—
ऐसा शास्त्र।
दर्शनशास्त्रोंके सामान्यरूपसे पहले दो विभाग किये जा सकते
हैं—आस्तिकदर्शन और नास्तिकदर्शन। आस्तिकदर्शन उन्हें कहते
हैं, जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार करके पारलौकिक अर्थका
निरूपण किया गया हो। और नास्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं—जिनमें
वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार न करके केवल युक्तिसे अर्थका प्रतिपादन
किया गया हो। इस प्रकारसे सामान्यतः द्विधा विभक्त दर्शनशास्त्रोंका
पुनः इस प्रकार अवान्तर विभाग किया गया है—आस्तिकदर्शन-शास्त्रोंके
फिर तीन विभाग हैं—न्याय, सांख्य और मीमांसा। न्यायशब्दसे गौतम और
कणाद महर्षि द्वारा प्रणीत न्याय और वैशेषिक, ये दो शास्त्र विवक्षित हैं।
साङ्ख्यशब्दसे कपिल और पतञ्जलि द्वारा लोकमें आविर्भूत सांख्य और
योग शास्त्र विवक्षित हैं। मीमांसाशब्दसे जैमिनि और भगवान् वेदव्यास
द्वारा प्रणीत पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा विवक्षित हैं। इसीलिए व्यवहार
होता है कि आस्तिकदर्शन छः प्रकारके हैं।
इसी रीतिसे नास्तिकदर्शनोंके भी पहले पहले चार्वाक, बौद्ध और जैन
इस प्रकार तीन विभाग करनेके बाद विनेयोंकी (शिष्योंकी) बुद्धिके अनुसार
विभक्त माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिकके भेदसे बौद्धदर्शनके
चतुर्विध होनेसे वे भी छः प्रकारके हैं। यद्यपि दर्शनशास्त्रके अन्य भी
अवान्तर भेद हैं, तथापि मुख्यरूपसे उनकी गणना न होनेके कारण
व्यावहारिक प्रसिद्धि नहीं है।
वेदप्रामाण्यवादी समुदायकी दृष्टिसे नास्तिकदर्शनोंमें परमपुरुषार्थ-
प्रयोजकता विवादास्पद है, क्योंकि किसी खास * प्रमाणविशेषका अनङ्गीकार।
येनोपदिश्येत शास्त्रं शास्त्रविदो विदुः ॥ अर्थात् हितसाधनोंमें प्रवृत्ति और अहितसाधनोंसे निवृत्ति जिससे बोधित होती हो, उसे शास्त्र कहा जाता है।
* अर्थात् सर्वप्रमाणाधिराज अपौरुषेय वेदवाक्योंके आधारके बिना ही केवल यौक्तिक बलके आधारपर नास्तिकमतावलम्बियोंका विचार प्रस्तुत हुआ है, अतः युक्ति अप्रतिष्ठित
[ ५ ]
करके केवल यौक्तिकवादका ही उनमें अङ्गीकार किया गया है । वेदविरुद्ध युक्तिके अप्रतिष्ठित होनेके कारण यथार्थरूपसे तत्त्वविनिश्चय उनसे नहीं हो सकता । यद्यपि इस विषयमें सत्प्रतिपक्ष हो सकता है कि आस्तिकदर्शनशास्त्रोंमें मोक्षोपयुक्तमार्गमदर्शकत्व नहीं है और नास्तिकदर्शनोंमें है । तथापि उभयदर्शनज्ञ प्रेक्षावान् पुरुषकी विचार-कसौटीमें कसे जानेके बाद नास्तिकदर्शन ही उक्तार्थमें पूतिकूष्माण्डीकृत प्रतीत होते हैं, अतः उक्त सत्प्रतिपक्ष प्रेक्षावत्पुरुषश्रद्धेय नहीं हो सकता है ।
आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका परस्पर भेद जिस-जिस अंशमें है, उसे संक्षेपसे बतलाना प्रकृतमें अनुपयुक्त नहीं होगा, अतः उसको दिखाते हैं—
न्यायशास्त्र
न्यायशास्त्रके मूल रचयिता महर्षि गौतम हैं । उन्होंने सोलह पदार्थ माने हैं—प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान * । इनके मतमें चार प्रमाण हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । इन सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे अनात्मभूत देह आदिमें आत्माकी जो मिथ्याज्ञानरूप भ्रान्ति है, उसकी निवृत्ति होती है और उससे राग † आदि दोषोंकी निवृत्ति होती है । दोषोंकी निवृत्तिसे शुभाशुभकर्मकी निवृत्ति, इससे निमित्तके अभावसे नैमित्तिक अनेक योनियोंमें जन्मकी निवृत्ति, और इससे गर्भावाससे लेकर मरण तकके सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्तिरूप मुक्ति होती है ।
वैशेषिकशास्त्र
वैशेषिक दर्शनके रचयिता कणाद मुनि हैं । इनके मतमें छः पदार्थ हैं—
होनेसे तदुदितविचार निरतिशयसुखपथप्रदर्शक नहीं हो सकते हैं । और पुरुषबुद्धिके भेदविभ्रमादिदोषविप्रलम्भाक्रान्त होनेके कारण भी उनका तत्त्वप्रतिपादन अवश्य भ्रान्त हो सकता है । अपौरुषेय वेदवाक्योंके निरस्तसमस्तदोषमूलक होनेके कारण उनमें ऐसी सम्भावना नहीं हो सकती है, ऐसा आस्तिकोंका तात्पर्य है ।
* इन पदार्थोंका प्रतिपादन करनेवाला गौतमका यह प्रथम सूत्र है—प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः [ गौ० सूत्र १ प्र० आ० १ सू० १ ] ।
† दुःख-जन्म-प्रवृत्ति-दोष-मिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः, यह सूत्र इसमें प्रमाण है ।
[ ६ ]
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं। उक्त छः * प्रकारके पदार्थोंके ईश्वरानुग्रहवश यथार्थज्ञानसे आत्यन्तिक दुःखकी निवृत्तिरूप मोक्षकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि उक्त प्रकारसे न्याय और वैशेषिकका परस्पर भेद है, तथापि प्रतिज्ञादिन्यायप्रयुक्त विचारकी प्रवृत्ति होनेसे दोनों शास्त्रोंमें न्यायशास्त्रत्वका व्यवहार होता है †।
निरीश्वरसांख्यशास्त्र
इस शास्त्रके प्रधान आचार्य कपिल मुनि हैं—इनके मतमें संक्षेपसे पहले चार प्रकारके पदार्थोंका विभाग किया गया है—प्रकृति, विकृति, प्रकृतिविकृति और प्रकृतिविकृतिसे रहित ‡। इन सामान्यरूपसे परिगणित पदार्थोंके विशेषरूपसे पच्चीस विभाग हैं—प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहङ्कार, मन, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ✕। और इसमें प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, ये तीन प्रमाण हैं। परम पुरुष जगत्के प्रति कारण नहीं है, किन्तु प्रकृति ही कारण है। सत्त्व, रज, और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं। किसी एक गुणके उद्रेक होनेपर वह प्रकृति कार्यकारणरूपमें परिणत होती
* यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ काणाद मतमें यत्र तत्र उपवर्णित हैं, तथापि अभावपदार्थके तुच्छ होनेसे वैशेषिक सूत्रमें उसकी गणना नहीं की गई है। धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां पदार्थानां साधर्म्य-वैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निः श्रेयसम्।
† अथवा न्यायशब्दका अर्थ परार्थानुमान होता है, और परार्थानुमान सम्पूर्ण ज्ञानोंका अनुग्राहक है और सब कर्मोंके अनुष्ठानमें परम्परया प्रयोजक भी है, अतः 'प्राधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति' इस न्यायसे इन शास्त्रोंमें न्यायशब्दका व्यवहार होता है। इस विषयमें अभियुक्तोंने कहा है कि 'सोऽयं परमो न्यायो विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात्' इत्यादि।
‡ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तुविकारो न प्रकृति र्नऽपि विकृतिः पुरुषः।
यह श्लोक इस पदार्थविभागमें प्रमाण है।
✕ इन पदार्थोंकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है—
प्रकृतेर्महान् ततोऽहङ्कारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः।
तस्मादपि च षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्च भूतानि ॥
अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्त्व, (बुद्धितत्त्व) महत्तत्त्वसे अहङ्कार, अहङ्कारसे एकादश इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा, और इन सोलहमें स्थित पञ्चतन्मात्रासे आकाशादि पञ्चभूत पदार्थ उत्पन्न होते हैं।
[ ७ ]
है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंमें सत्त्वादि गुणत्रयकी अवस्थिति है, अतः उनका कारण गुणत्रयवती प्रकृति ही हो सकती है, यह उनका सिद्धान्त है। इसमें ईश्वरका प्रतिपादन नहीं है, अतः यह निरीश्वरसाङ्ख्य कहलाता है। इस मतमें प्रकृति और पुरुषके विवेक-प्रत्ययसे मुक्ति होती है। इसका अन्य अवान्तर भेद साङ्ख्यकारिका आदि ग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्र
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्रको योगशास्त्र कहते हैं। इसके मूलभूत प्रणेता आचार्य पतञ्जलि मुनि हैं। इन्होंने सम्पूर्ण योगशास्त्रके तत्त्वोंका चारपादोंमें समावेश किया है, इसीको योगसूत्र कहते हैं। पदार्थविवेकमें पूर्वोक्त साङ्ख्यशास्त्रकी अपेक्षा एक अधिक परमेश्वर पदार्थ* माना गया है, अतः इनके मतमें छब्बीस पदार्थ हैं। प्रकृतिमें अधिष्ठित परमात्माके महत्तत्त्व, काल और पुरुष—कार्योपाधि जीव—इस प्रकार तीन पदार्थ भी ये लोग मानते हैं। जब परमात्माकी असीम कृपासे अष्टाङ्गयोग द्वारा जीवका अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब अपनेको बुद्धि आदि पदार्थोंसे भिन्न समझता हुआ वह कैवल्यरूप अमृतसागरमें अवगाहन कर समस्त दुःखोंसे विमुक्त हो जाता है, इस प्रकार उनके मतका संक्षेप है।
पूर्वमीमांसाशास्त्र
पूर्वमीमांसाशास्त्रकी सूत्रों द्वारा सबसे पहले आचार्य जैमिनिने संसारमें प्रसिद्धि की। इन्होंने 'अथातो धर्मजिज्ञासा' आदि सूत्रोंसे बारह अध्यायोंमें केवल धर्माधर्मका ही विचार किया है। पूर्वमीमांसाको छोड़कर दर्शन शास्त्रोंमें से किसी भी शास्त्रमें इतने सूत्र नहीं हैं। इस शास्त्रमें दो मत प्रचलित हैं—कुमारिलभट्टका मत और प्रभाकरका मत। इन मतोंको भाट्टमत और गुरुमत भी कहते हैं। इनमें भाट्टानुसारी छः प्रमाणोंसे वस्तुकी सिद्धि करते हैं। वे छः प्रमाण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि हैं। और प्रभाकरके मतमें अनुपलब्धिप्रमाणके न होनेसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और अर्थापत्ति पांच ही प्रमाण हैं, क्योंकि वे अभावको पदार्थ नहीं मानते हैं, प्रत्युत उसे अधिकरणस्वरूप मानते हैं, अतः अभावके प्रत्यक्षके लिए अनुपलब्धिप्रमाणकी इनके मतमें आवश्यकता
* 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' अर्थात् क्लेश आदिसे रहित पुरुष-विशेष ईश्वर है, यह सूत्र पतञ्जलिके मतमें ईश्वरकी स्वीकृतिका प्रमाणरूप है।
[ ८ ]
नहीं है। प्रमेयविभागके अवसरमें प्रभाकरानुयायी—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, शक्ति, सङ्ख्या और सादृश्य इस प्रकारसे आठ पदार्थ मानते हैं। मीमांसक ईश्वरको नहीं मानते। कुछ साम्प्रदायिक कहते हैं कि मीमांसक ईश्वर नहीं मानते, ऐसी बात नहीं है, किन्तु ईश्वरके होते हुए भी वह स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् तत्-तत् कर्मोंके अनुसार तत्-तत् प्राणियोंको शुभाशुभ फल देनेके कारण वह ईश्वर परतन्त्र है, अतएव उसका अस्तित्व अकिञ्चित्कर होनेसे नहींके बराबर ही है। मनुष्य धर्माधर्मका ठीक-ठीक परिज्ञान करके उनके अनुष्ठान द्वारा स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यही मोक्ष है, क्योंकि स्वर्गकी प्राप्तिसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, वह सुखस्वरूप है। ज्ञानकाण्डको ये लोग स्वार्थमें प्रमाण नहीं मानते हैं। अन्य अधिक विस्तार मीमांसाग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
उत्तरमीमांसाशास्त्र
उत्तरमीमांसा शास्त्रका सूत्रों द्वारा भगवान् वेदव्यासने ग्रथन किया है। इसका सम्पूर्ण विचार चार अध्यायोंमें है, जिनका क्रमशः समन्वयाध्याय, अविरोधाध्याय, साधनाध्याय और फलाध्यायसे भी व्यवहार होता है। उत्तरमीमांसामें वेदके ज्ञानकाण्डका विचार है। प्रकृतमें मीमांसाशब्दका अर्थ पूजित विचार होता है। उसी विचारको पूजित विचार कहते हैं—जो कि मनुष्योंको निरतिशयनित्यसुखकी साधनताका यथार्थ परिज्ञान करानेमें समर्थ हो। और पूर्वमीमांसामें आये हुए मीमांसाशब्दका अर्थ—धर्माधर्मविषयक विचार—करना चाहिए। इस प्रकारके भिन्नार्थकत्वमें केवल पूर्वोत्तरशब्द ही प्रमाणरूपसे बस हैं। इसी उत्तरमीमांसाके लिए वेदान्तशब्दका व्यवहार होता है। यद्यपि वेदान्तशब्दका मुख्य अर्थ वेदका उपनिषद्भाग ❋ है, तथापि परम्परया उपनिषद्भागके अर्थनिर्वचनमें उपकारक शारीरकमीमांसा † आदि भी वेदान्तशब्दका अर्थ होता है।
❋ वेदका सामान्यतः तीन काण्डोंमें विभाग किया गया है—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड, इनमें ज्ञानकाण्डको अर्थात् आत्मतत्त्वप्रतिपादक वेदविभागको उपनिषत् कहते हैं।
† शारीरक—जीवात्मा—त्वंपदवाच्य पदार्थ, उसका तत्पदवाच्य परमात्माके साथ अभेद प्रतिपादनके लिए जो मीमांसा है, उसको शारीरकमीमांसा कहते हैं, अर्थात् ब्रह्मसूत्रभाष्य आदि।