सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७१
इष्ट ईश उपादानं सर्वस्मिन् व्यावहारिके ।
प्रातिभासिककार्ये तु जीव इत्यपरे जगुः ॥२२॥
सम्पूर्ण व्यावहारिक पदार्थोंका उपादान ईश्वर है और प्रतिभासिक पदार्थोंका उपादान जीव है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २२ ॥
“एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी” ॥
इत्यादिश्रुतेः कृत्स्नव्यावहारिकप्रपञ्चस्य ब्रह्मैव उपादानम् । जीवस्तु प्रातिभासिकस्य स्वप्नप्रपञ्चस्य च । ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’
‘एतस्माज्जायते०’ ( इस प्रकृत ईश्वरलूप उपादानसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण पदार्थोंकी आधारभूत पृथ्वी उत्पन्न हुई ) इत्यादि श्रुतिसे सम्पूर्ण व्यावहारिक घट आदि प्रपञ्चका ब्रह्म ही उपादान कारण है और प्रातीतिक स्वप्नके प्रपञ्चोंका अर्थात् स्वप्न सृष्टिमें देखे जानेवाले प्रतीतिकालावस्थायी भ्रमात्मक पदार्थोंका जीव ही उपादान कारण है, क्योंकि ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ * इस अधिकरणमें ‘जगत्का उपादान
धर्त्ता माना जाय, तो उसके मायावी होनेसे उसमें व्यामोहका अभाव है, यह नहीं कह सकते । और इच्छाके अनुसार माया कर सकते हैं और अविद्या नहीं कर सकते यह युक्ति भी भेदमें नहीं दे सकते, क्योंकि मन्त्र और औषध आदिमें कर्ताका स्वातन्त्र्य है, मायामें नहीं है अविद्यामें भी द्विचन्द्र आदि भ्रम कर्ताकी इच्छाके अधीन होते हैं । और शास्त्रीयव्यवहारसे भी माया एवं अविद्याका भेद नहीं है, क्योंकि ‘भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ इत्यादि श्रुतिसे यथार्थ ज्ञानसे निवर्त्य अविद्यामें मायाशब्दका प्रयोग होता है । ‘तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥’ इस श्रुतिमें भी माया और अविद्या-का सामानाधिकरण्यसे ( एकार्थकत्वसे ) निर्देश कर तत्त्वज्ञानसे तैरना बतलाया है । इसी प्रकार भगवान् सूत्रकारने ‘मायामात्रन्तु कात्स्न्ये॑नानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्’ इस सूत्रमें स्वप्नमें भी मायाशब्दका प्रयोग किया है । भाष्यकारने भी ‘अविद्यामायाऽविद्यात्मिका मायाशक्तिः’ ( अविद्या-माया है मायाशक्ति भी अविद्यारूप है ) इस वाक्यसे माया और अविद्याका अभेद दर्शाया है अतः यह स्पष्ट हुआ कि माया और अविद्याका अभेद है, भेद नहीं है ।
* ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रका अर्थ है, यदि ब्रह्मका सर्व अंशसे परिणाम माना जाय, तो कृत्स्नप्रसक्ति होगी अर्थात् जैसे दधिके आकारसे परिणत दुग्धकी अपने स्वरूपसे हानि होती है, वैसे ही ब्रह्मकी अपने रूपसे हानि होगी । और एक देशसे