सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ७२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ७ सू० २६ ) इत्यधिकरणे ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे तस्य कात्स्न्येन जगदाकारेण परिणामे विकारातिरेकेण ब्रह्माभावो वा, एकदेशेन परिणामे निरवयवत्वश्रुतिविरोधो वा प्रसज्यते इति पूर्वपक्षे 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २८ ) इति सूत्रेण विवर्तवादाभिप्रायेण स्वप्नदृशि जीवात्मनि स्वरूपानुपमर्दनेनाऽनेकाकारस्वाप्नप्रपञ्चसृष्टिवत् ब्रह्मणि वियदादिसृष्टिरुपपद्यते इति सिद्धान्तितत्वादित्यन्ये ।
ब्रह्म है' इस सिद्धान्तमें शङ्का की है कि क्या ब्रह्म सर्वांशसे जगदाकारमें परिणत होता है या एकदेशसे ? प्रथम पक्षमें ( जैसे दधिरूपमें दूधके परिणत होनेसे दूध रहता ही नहीं है, वैसे ही ) ब्रह्मके सर्वांशसे जगद्रूपमें परिणत होनेपर जगत्से पृथक् ब्रह्मका अस्तित्व नहीं रहेगा; यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् एकदेशसे ब्रह्मका परिणाम माना जाय, तो ब्रह्मके निरवयवत्वका प्रतिपादन करनेवाली ( 'अजो नित्यः शाश्वतो' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता है, नित्य—अवयवरहित और सनातन है ) इस श्रुतिके साथ विरोध होगा। अतः दोनों मार्गोंसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं हो सकता है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर † 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे विवर्तवादके अभिप्रायसे 'जैसे जीवके स्वरूपके बिगड़े बिना ही स्वप्न देखनेवाले जीवात्मामें अनेक आकार-प्रकारवाली स्वप्न पदार्थोंकी सृष्टि बनती है, वैसे ही ब्रह्मके स्वरूपमें कुछ भी विकृति न होकर आकाश आदि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है' इस प्रकारका सिद्धान्त किया गया है, ऐसा भी कुछ लोगोंका मत है ।
परिणाम माना जाय, तो निरवयवत्वशब्दकोप होगा अर्थात् ब्रह्मकी निरवयवताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध होगा।
† आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि। इस सूत्रमें प्रथम 'च' शब्दका अर्थ यथा ( जैसे ) है और द्वितीयका अर्थ तथा ( वैसे ही ) है और 'हि' शब्द हेतु अर्थमें है। इसलिए जैसे आत्मनि-स्वप्नद्रष्टा जीवमें विचित्र—विलक्षण रथ आदि सृष्टि प्रतीत होती है, और उसके स्वरूपका विनाश नहीं होता है, क्योंकि स्वप्नावस्थाकी निवृत्तिके बाद भी साक्षीरूपसे जीव चैतन्य पूर्ववत् ही रहता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपविनाशके बिना विचित्र आकाश आदि सृष्टि उत्पन्न होती है।