सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextब्रह्मकी कारणताको विचार ] भाषानुवादसहित ६९
'गताः कलाः' इति श्रुतिस्तु तत्त्वविदि म्रियमाणे समीपवर्तिनः पुरुषाः नश्यद्घटवत्तदीयशरीरादीनामपि भूम्यादिषु लयं मन्यन्ते इति तटस्थपुरुषप्रतीतिविषयेति व्यवस्थायाः कलालयाधिकरणभाष्ये स्पष्टत्वात्, इति मायाऽविद्याभेदवादिष्वेकदेशिनः ॥
मायाऽविद्यैक्यवादेऽपि जीवतादात्म्यदर्शनात् ।
जीव एव हि लिङ्गादेरुपादानमितीतरे ॥ २१ ॥
माया और अविद्याका अभेद मानने वालोंमें भी कुछ लोग अन्तःकरण आदिकी जीवके साथ तादात्म्यप्रतीति होनेसे अन्तःकरण आदिका जीव ही उपादान है, ऐसा कहते हैं ॥ २१ ॥
तदभेदवादिष्वपि केचित्—यद्यपि वियदादिप्रपञ्चस्य ईश्वर उपादानम्, तथाऽप्यन्तःकरणादीनां जीवतादात्म्यप्रतीतेः जीव एवोपादानम् ।
अत एवाऽध्यासभाष्ये अन्तःकरणादीनां जीवे एवाऽध्यासो दर्शितः ।
यह भाव है। और 'गताः कलाः०' इत्यादि श्रुति तो तत्त्वज्ञानीके मर जानेपर समीपस्थ पुरुष जैसे चूर्णावशेष घटका विनाश भूमिमें देखते हैं, वैसे ही उसके शरीर आदिका भूमि आदिमें लय मानते हैं। इस प्रकार तटस्थपुरुषविषयक है, ऐसी व्यवस्था कलालयाधिकरणभाष्यमें स्पष्टरूपसे की गई है।
माया और अविद्याको जो अभिन्न मानते हैं, उनमेंसे कुछ लोग कहते हैं—यद्यपि आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका ईश्वर ही उपादान है, तथापि अन्तःकरण आदिमें जीवके तादात्म्यकी प्रतीति होनेसे उनका—अन्तःकरण आदिका—जीव ही उपादान है *।
इसीसे अध्यासभाष्यमें अन्तःकरण आदिका जीवमें ही अध्यासभ्रम बत-
* माया ही अविद्या है और वह ईश्वरकी उपाधि है अर्थात् मायाशबलित चैतन्य ईश्वर है और प्रतिबिम्बभूत जीवोंकी उपाधियाँ अन्तःकरण हैं, इस रीतिसे माया और अविद्याको अभिन्न मानकर व्यवस्था करनेवालोंमें से भी भेदवादियोंके समान कुछ लोग अन्तःकरण आदिमें जीवको उपादान मानते हैं। 'तदभेदवादिष्वपि' इसमें 'अपि' शब्दसे पूर्व मतके साथ किसी अंशमें समानता है, यह प्रतीत होता है और उस विशेषताका 'तथापि' ग्रन्थसे स्पष्टीकरण होता है अर्थात् जैसे ईश्वरमें रहनेवाली मायाके परिणामी होनेसे महाभूतोंके प्रति ईश्वर उपादान है वैसे ही माया और अविद्याके अभिन्न होनेसे अविद्यापरिणामी अन्तःकरण आदि भी ईश्वरा-