सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context६८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
महाभूतपरिणामरूपोपष्टम्भकांशाभिप्रायेण तेषां स्वस्वप्रकृतिषु लयो दर्शित इति मायाऽविद्याभेदवादिनः ।
लिङ्गादौ जीव एवेति केचित्तत्रैकदेशिनः ।
महाभूतलयोक्तिस्तु कलानामन्यदृष्टितः ॥२०॥
माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग लिङ्गशरीर और अन्तःकरण आदिका उपादान जीव ही है कलाओंकी महाभूतोंमें लयोक्ति तो तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिसे है, ऐसा कहते हैं ॥ २० ॥
यथा वियदादिप्रपञ्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्र ईश्वर उपादानम्, तथाऽन्तःकरणादि जीवाश्रिताविद्यामात्रपरिणाम इति तत्र जीव एव उपादानम् ।
न चान्तःकरणादौ मायाकार्यमहाभूतानामप्यननुप्रवेशे उदाहृतश्रुतिद्वयव्यवस्थाऽनुपपत्तिः । कलानां विद्ययोच्छेदश्रुतिस्तत्त्वविद्द्दष्टिविषया ।
महाभूतोंके—प्रति गई अर्थात् उनमें लीन हुई) इस प्रकारकी अन्य श्रुतिमें जीवकी विद्यासे निवृत्त न होनेवाली मायाके कार्य महाभूतोंका परिणामरूप जो उपष्टम्भक अंश है, उसके आधारपर उन पञ्चदश कलाओंका अपनी-अपनी प्रकृतिमें विलय बतलाया गया है, यह उन लोगोंका मत है, जो माया और अविद्याको भिन्न-भिन्न मानते हैं ।
माया और अविद्याको भिन्न माननेवालोंमें से कुछ लोगोंका मत है कि जैसे आकाश आदि महाभूत प्रपञ्च ईश्वरकी आश्रित मायाका परिणाम है, अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चमें ईश्वर उपादान है, वैसे ही अन्तःकरण आदि जीवकी आश्रित केवल अविद्याके परिणाम हैं, इसलिए उनमें जीव ही उपादान है, ईश्वर उपादान नहीं है ।
यदि कोई कहे कि मायाके कार्य जो महाभूत हैं, उनका अन्तःकरण आदिमें अनुप्रवेश न माना जाय, तो पूर्वमें उदाहृत दो श्रुतियोंकी व्यवस्था नहीं होगी, नहीं, व्यवस्था होगी, क्योंकि 'एवमेवास्य' इत्यादि प्राण, मन आदि कलाओंका विद्यासे उच्छेदबोधन करनेवाली जो श्रुति है, वह तत्त्वविद्द्दष्टिविषयक है अर्थात् आत्मतत्त्वको जाननेवाला जो पुरुष है, उसकी जो दृष्टि-तत्त्व-साक्षात्कार तद्विषयक है—पुरुषमें कलालयश्रुति साक्षात्कारके अभिप्रायसे है,