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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 92 of 590

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Page 92
६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अत एव भाष्ये 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (उ० मी० अ० १ पा० १

शबल अर्थात् मायारूप उपाधिसे विशिष्ट * ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है, ऐसा ज्ञात होता है।

इसीसे—ईश्वररूप ब्रह्म ही उपादान है, ऐसा स्वीकार करनेसे †'अन्त-


* 'मायाविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है' यह विवरणका मत है, अतः इसकी परिपुष्टि करनेके लिए हम यहाँ विवरणकी कुछ पङ्क्तियाँ उद्धृत करते हैं—

'तस्मादनिर्वचनीयमायाविशिष्टं कारणं ब्रह्मेति प्राप्तम् ......... ... त्रैविध्यमत्र सम्भवति— रज्ज्वाः संयुक्तसूत्रद्वयवत् मायाविशिष्टं ब्रह्म कारणमिति वा 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' इति श्रुतेः मायाशक्तिमत्कारणमिति वा, जगदुपादानमायाश्रयतया ब्रह्मकारणमिति वा। तत्र विशिष्टपक्षे तथैव ब्रह्मानेनोपलक्षितस्य ज्ञानानन्दादिस्वरूपलक्षणेन मायानिष्कर्पलक्षणद्वयेन विशुद्धब्रह्मसिद्धिः । उत्तरपक्षयोस्तु मायाया ब्रह्मपरतन्त्रत्वात् तत्कार्यमपि ब्रह्मपरतन्त्रं भवति; यथाऽंशु-तन्त्रतन्त्वारब्धोऽपि पटोऽशुतन्त्रः प्रतीयते । ततश्च उत्पद्यमानकार्यस्य यद् आश्रयोपाधिज्ञानानन्दलक्षणं च तद् ब्रह्मेति शुद्धब्रह्मलाभ इति”। (टीकानवकोपेत शा० पृ० ९०७ कल० मुद्रित) अर्थात् इससे अनिर्वचनीय मायासे विशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌का उपादान है, यह सिद्ध हुआ, इसमें तीन प्रकार भासते हैं—जैसे रज्जुके प्रति संयुक्त दो सूत्र कारण हैं, वैसे ही मायाविशिष्ट ब्रह्म कारण है—माया भी विशेषणरूपसे कारण है, अथवा 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार मायाशक्तिसे युक्त ब्रह्म कारण है, अथवा जगत्‌की उपादान मायाके आश्रयरूपसे ब्रह्म कारण है। प्रथम पक्षमें ब्रह्मका लक्षण—जगत्कारणस्वरूप मायामें जाता है, तथापि ज्ञानानन्दरूप स्वरूपलक्षणके प्रवेशसे शुद्ध ब्रह्म ही सिद्ध होगा। द्वितीयादि पक्षमें जैसे अंशुके (तन्तुके अवयवके) अधीन तन्तुसे आरब्ध पट अंशुतन्त्र ही है, वैसे ही ब्रह्मपरतन्त्र मायाका कार्य भी ब्रह्मपरतन्त्र ही होगा, इसलिए उत्पद्यमान कार्यका जो आश्रयोपाधि (अज्ञान सत्ताका हेतु) ज्ञान और आनन्द लक्षण है, वह ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होगा। इससे यह बात मालूम होती है—विवरणकार यद्यपि औपाधिक ब्रह्मको कारण मानते हैं, तथापि शुद्ध ब्रह्मकी सिद्धि तो किसी रूपसे होती ही है।

† 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें विचार किया गया है कि छान्दोग्यमें 'एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः' (जो यह सूर्यके अन्दर ज्योतिःस्वरूप पुरुष है) इत्यादिका उपक्रम करके 'य एषोन्तरऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (जो यह चक्षुके भीतर पुरुष देखा जाता है) इत्यादि सुना जाता है। यहांपर संशय होता है—आदित्य और आँखके अन्दर रहनेवाला कोई विशिष्ट जीव है या ईश्वर है। पूर्वपक्षीके अभिप्रायसे जीवके प्राप्त होनेपर सिद्धान्त करते हैं कि आदित्य आदिमें रहनेवाला ईश्वर ही है, क्योंकि उन श्रुतियोंमें ईश्वरके धर्मोंका कथन मिलता है—सर्वात्मकत्व—सर्वतादात्म्यत्वरूप धर्म सर्वोपादान होनेसे ईश्वरमें ही है, जीवमें नहीं है, कारण कि जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होनेसे जगत्‌के प्रति कारण नहीं है। अतः सर्वात्मकत्व उसमें नहीं हैं, इसलिए आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष जीव नहीं है। और