सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६३
तथा च 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादिकारणवाक्येषु शबलवाचिनामात्मादिशब्दानां शुद्धे लक्षणैवेति ।
सार्वत्म्यस्येशालिङ्गत्वात् यः सर्वज्ञ इति श्रुतेः ।
मायोपहितमीशं तदाहुर्विवरणानुगाः ॥ १८ ॥
'सैव ॠक् तत्साम' इत्यादि श्रुतिसे कहा गया सर्वात्मकत्व ईश्वरमें लिङ्ग है और 'यः सर्वज्ञः' इस प्रकार श्रुति है; अतः जगत्का उपादान मायोपाधिक चैतन्य अर्थात् ईश्वर ही है, ऐसा विवरणानुसारी कहते हैं ॥ १८ ॥
विवरणानुसारिणस्तु—'यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' इति श्रुतेः सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं मायाशबलमीश्वररूपमेव ब्रह्म उपादानम् ।
और उसके भाष्यमें जगदुपादानत्व ज्ञातव्य ब्रह्मका लक्षण कहा गया है ।
इसलिए 'आत्मन आकाशः०' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि ‡ कारणप्रतिपादक वाक्योंमें शबलवाची—मायासे युक्त चैतन्यके बोधक—'आत्म' शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा ही है ।
'यः सर्वज्ञः सर्ववित्०' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय—स्वरूपज्ञानका विकार है, उस सर्वज्ञ ब्रह्मसे हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त मायासे
हो लक्षण किया जाता है, यह अवश्य स्वीकार करना होगा, अन्यथा अप्रतिज्ञातके लक्षणका प्रसङ्ग होगा, अतः सूत्र-भाष्यकी मर्यादाका संरक्षण करनेके लिए उन शबलवाची आत्मार्थक शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा करनी होगी, यह संक्षेपशारीरककारके अनुयायियोंका मत है ।
‡ यद्यपि 'तद्विजिज्ञासस्व' इत्यादि वाक्यशेषसे शुद्ध ब्रह्म ही जिज्ञास्य है और उसका 'यतो वा' इत्यादि श्रुतिसे लक्षण किया गया है, अतः इस शङ्काका अवसर नहीं है कि शुद्ध ब्रह्म कारण है या जीवरूप या ईश्वर, तथापि जैसे शुद्ध ब्रह्म जिज्ञास्य है, वैसे ही जीव और ईश्वर, जो 'त्वम्' और 'तत्' शब्दसे वाच्य हैं, जिज्ञास्य हैं, क्योंकि वे भी शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानके प्रति हेतु हैं, अतः उनमें भी जगत्के प्रति उपादानता है, इसलिए शङ्काका होना सम्भव है, और चैतन्यके तीन भेद भी शास्त्रमें मिलते हैं—
जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा ।
अविद्या तचितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥
अर्थात् जीव, ईश्वर, शुद्ध चैतन्य ( ब्रह्म ), जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या और चित्का सम्बन्ध, ये छः अनादि हैं, इनमें चैतन्यके तीन भेद प्रतीत होते हैं, अतः प्रश्न होता है ।