सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंमें सत्त्वादि गुणत्रयकी अवस्थिति है, अतः उनका कारण गुणत्रयवती प्रकृति ही हो सकती है, यह उनका सिद्धान्त है। इसमें ईश्वरका प्रतिपादन नहीं है, अतः यह निरीश्वरसाङ्ख्य कहलाता है। इस मतमें प्रकृति और पुरुषके विवेक-प्रत्ययसे मुक्ति होती है। इसका अन्य अवान्तर भेद साङ्ख्यकारिका आदि ग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्र
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्रको योगशास्त्र कहते हैं। इसके मूलभूत प्रणेता आचार्य पतञ्जलि मुनि हैं। इन्होंने सम्पूर्ण योगशास्त्रके तत्त्वोंका चारपादोंमें समावेश किया है, इसीको योगसूत्र कहते हैं। पदार्थविवेकमें पूर्वोक्त साङ्ख्यशास्त्रकी अपेक्षा एक अधिक परमेश्वर पदार्थ* माना गया है, अतः इनके मतमें छब्बीस पदार्थ हैं। प्रकृतिमें अधिष्ठित परमात्माके महत्तत्त्व, काल और पुरुष—कार्योपाधि जीव—इस प्रकार तीन पदार्थ भी ये लोग मानते हैं। जब परमात्माकी असीम कृपासे अष्टाङ्गयोग द्वारा जीवका अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब अपनेको बुद्धि आदि पदार्थोंसे भिन्न समझता हुआ वह कैवल्यरूप अमृतसागरमें अवगाहन कर समस्त दुःखोंसे विमुक्त हो जाता है, इस प्रकार उनके मतका संक्षेप है।
पूर्वमीमांसाशास्त्र
पूर्वमीमांसाशास्त्रकी सूत्रों द्वारा सबसे पहले आचार्य जैमिनिने संसारमें प्रसिद्धि की। इन्होंने 'अथातो धर्मजिज्ञासा' आदि सूत्रोंसे बारह अध्यायोंमें केवल धर्माधर्मका ही विचार किया है। पूर्वमीमांसाको छोड़कर दर्शन शास्त्रोंमें से किसी भी शास्त्रमें इतने सूत्र नहीं हैं। इस शास्त्रमें दो मत प्रचलित हैं—कुमारिलभट्टका मत और प्रभाकरका मत। इन मतोंको भाट्टमत और गुरुमत भी कहते हैं। इनमें भाट्टानुसारी छः प्रमाणोंसे वस्तुकी सिद्धि करते हैं। वे छः प्रमाण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि हैं। और प्रभाकरके मतमें अनुपलब्धिप्रमाणके न होनेसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और अर्थापत्ति पांच ही प्रमाण हैं, क्योंकि वे अभावको पदार्थ नहीं मानते हैं, प्रत्युत उसे अधिकरणस्वरूप मानते हैं, अतः अभावके प्रत्यक्षके लिए अनुपलब्धिप्रमाणकी इनके मतमें आवश्यकता
* 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' अर्थात् क्लेश आदिसे रहित पुरुष-विशेष ईश्वर है, यह सूत्र पतञ्जलिके मतमें ईश्वरकी स्वीकृतिका प्रमाणरूप है।