सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं। उक्त छः * प्रकारके पदार्थोंके ईश्वरानुग्रहवश यथार्थज्ञानसे आत्यन्तिक दुःखकी निवृत्तिरूप मोक्षकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि उक्त प्रकारसे न्याय और वैशेषिकका परस्पर भेद है, तथापि प्रतिज्ञादिन्यायप्रयुक्त विचारकी प्रवृत्ति होनेसे दोनों शास्त्रोंमें न्यायशास्त्रत्वका व्यवहार होता है †।
निरीश्वरसांख्यशास्त्र
इस शास्त्रके प्रधान आचार्य कपिल मुनि हैं—इनके मतमें संक्षेपसे पहले चार प्रकारके पदार्थोंका विभाग किया गया है—प्रकृति, विकृति, प्रकृतिविकृति और प्रकृतिविकृतिसे रहित ‡। इन सामान्यरूपसे परिगणित पदार्थोंके विशेषरूपसे पच्चीस विभाग हैं—प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहङ्कार, मन, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ✕। और इसमें प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, ये तीन प्रमाण हैं। परम पुरुष जगत्के प्रति कारण नहीं है, किन्तु प्रकृति ही कारण है। सत्त्व, रज, और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं। किसी एक गुणके उद्रेक होनेपर वह प्रकृति कार्यकारणरूपमें परिणत होती
* यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ काणाद मतमें यत्र तत्र उपवर्णित हैं, तथापि अभावपदार्थके तुच्छ होनेसे वैशेषिक सूत्रमें उसकी गणना नहीं की गई है। धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां पदार्थानां साधर्म्य-वैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निः श्रेयसम्।
† अथवा न्यायशब्दका अर्थ परार्थानुमान होता है, और परार्थानुमान सम्पूर्ण ज्ञानोंका अनुग्राहक है और सब कर्मोंके अनुष्ठानमें परम्परया प्रयोजक भी है, अतः 'प्राधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति' इस न्यायसे इन शास्त्रोंमें न्यायशब्दका व्यवहार होता है। इस विषयमें अभियुक्तोंने कहा है कि 'सोऽयं परमो न्यायो विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात्' इत्यादि।
‡ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तुविकारो न प्रकृति र्नऽपि विकृतिः पुरुषः।
यह श्लोक इस पदार्थविभागमें प्रमाण है।
✕ इन पदार्थोंकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है—
प्रकृतेर्महान् ततोऽहङ्कारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः।
तस्मादपि च षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्च भूतानि ॥
अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्त्व, (बुद्धितत्त्व) महत्तत्त्वसे अहङ्कार, अहङ्कारसे एकादश इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा, और इन सोलहमें स्थित पञ्चतन्मात्रासे आकाशादि पञ्चभूत पदार्थ उत्पन्न होते हैं।