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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 89 of 590

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Page 89

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६१


अथ शुद्धमुपादानमीश्वरो जीव एव वा ।
शुद्धं सङ्क्षेपकमते ज्ञेयलक्षणवर्णनात् ॥ १७ ॥

अब संशय होता है कि शुद्ध ब्रह्म उपादान है या ईश्वररूप या जीवरूप ? इसमें शुद्ध ब्रह्म उपादान है, ऐसा संक्षेपशारीरककारका मत है, क्योंकि ज्ञेय ब्रह्मका ही लक्षण किया गया है ॥ १७ ॥

अथ शुद्धं ब्रह्म उपादानमिष्यते, ईश्वररूपम्, जीवरूपं वा । अत्र


अब ब्रह्ममें सामान्यरूपसे उपादानत्वके ज्ञात होनेके बाद जिज्ञासा होती है कि जिस ब्रह्मको समस्त जगत्‌के प्रति उपादान कारण मानते हो, क्या वह


अगत्या माननी होगी, और इसीसे उत्तर क्षणमें भी अभेदकी ही सिद्धि होगी, इस प्रकार सांख्य-मतानुयायी कहते हैं। कार्य और कारणका भेद माननेवाले नैयायिक लोग कहते हैं कि कार्यकारणका अभेद नहीं हो सकता, क्योंकि जो एक ही वस्तु है उसमें कार्यकारणभाव किसी भी प्रमाणके बलसे सिद्ध नहीं हो सकता अर्थात् एक वस्तुमें अपना कार्यत्व और कारणत्व ये विरुद्ध धर्म कैसे रह सकेंगे और कार्य और कारणका अभेद माननेसे अर्थक्रियाके भेदका अभाव भी होगा—अन्यथा जलका आहरण मृत्तिकासे भी प्रसक्त होगा, क्योंकि अभेदवादियोंके मतमें घट और मृत्तिका एक ही हैं। और मृत्तिकाके समान घटसे भी घटकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग आवेगा। इस प्रकार भेदवादी और अभेदवादीये दर्शित युक्तियोंसे परस्पर प्रतिक्षेप नहीं कर सकते हैं, अतः कार्यका कारणके साथ भेद है या अभेद है तथा कार्यके पूर्वकालमें कार्यका सत्त्व है या असत्त्व है, इसका निरूपण करना असम्भव होनेसे अर्थात् उसे अनृत ही मानना होगा। और जो कारण है, वह तो कार्यके पूर्वकाल और कार्यकालमें अनुवर्तमान है। अतः उसका कार्यसे पृथक्रूपतया निरूपण कर सकते हैं, इसलिए कार्यकी अपेक्षा कारण सत्य होगा, यद्यपि मृत्तिका आदि अवान्तर कारण तत्तत् कार्योंकी तुलनामें सत्यसे है, परन्तु पारमार्थिक सत्यता तो उनमें नहीं ही है, क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (घट आदि विकारोंका केवल वाणीसे ही व्यवहार होता है, अतः उनका नाम मात्र है, कोई अर्थ नहीं है—अर्थात् वस्तुके न रहनेपर भी 'पुरुषस्य चैतन्यम्' इत्यादिके समान 'घट है' इस प्रकार विकल्प मात्र होता है, तो सत्य क्या है? इसपर श्रुति कहती है 'मृत्तिकेत्येव' अर्थात् कारणरूपसे प्रतीयमान मृत्तिका ही सत् वस्तु है) इस प्रकारकी श्रुति ब्रह्मान्यतिरिक्त सब प्रपञ्चका असत्य और बाधितरूपसे बोधन करती है। यह श्रुति केवल दृष्टान्तरूपमें है—अर्थात् जैसे घट आदि स्थूल विकारोंमें अनुवर्तमान मृत्तिका सत्य है, वैसे ही समन्तात् दृश्यमान पदार्थोंमें अनुवर्तमान 'सत्' पदार्थ ही कारणरूपसे सत्य है और इतर असत्य हैं, इस प्रकार प्रपञ्च, अनिर्वाच्य होनेसे, अनृत है और दुर्वच है, इसलिए मूलकारने ठीक कहा है कि 'तद्व्यतिरेकेण दुर्वचम्' इत्यादि। यहाँ व्यतिरेक शब्दका अर्थ भेद है।