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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 88 of 590

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Page 88
६०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

कारणाभिन्नं कार्यं परिणामः, तदभेदं विनैव तद्व्यतिरेकेण दुर्वचं कार्यं विवर्तः इति वा विवर्तपरिणामयोर्विवेकः ॥ ३ ॥

अथवा उपादान कारणसे अभिन्न कार्य परिणाम है और उपादानसे अभिन्न न होकर उपादानके बिना दुर्वच–जिसका निर्वचन करना सम्भव नहीं ऐसा कार्य विवर्त है । इस प्रकार विवर्त और परिणाममें भेद है* ॥३॥


  • अन्य रीतिसे भी विवर्त और परिणामके लक्षण कहते हैं—'उपादानकारणत्वाभिमतवस्तु-भिन्नत्वे सति तत्कार्यत्वम्, परिणामत्वम् । अर्थात् कारणरूपसे मानी जानेवाली वस्तुसे अभिन्न होकर उसका जो कार्य हो, वह परिणाम । घट मृत्तिकासे अभिन्न भी है और मृत्तिकाका कार्य भी है, अतः लक्षणसमन्वय है ।

और 'तदभेदं विनैव तद्व्यतिरेकेण दुर्वचं कार्यं विवर्तः' इस मूलसे कार्यरूप विवर्तका ही लक्षण किया गया है, क्योंकि मूलकारने लक्षणमें कार्यशब्दका प्रक्षेप किया है, अथवा लक्षणमें कार्यत्वकी अविवक्षा करनी चाहिए, इससे अनादि अविद्यामें भी, जो ब्रह्मविवर्त है, विवर्तत्वका लक्षण घट जायगा और अव्याप्ति नहीं होगी । 'तदभेदं विना' इसका अर्थ—वस्तुसत् अभेदके विना, अतः प्रातीतिक अभेद होनेपर भी असङ्गति नहीं है । इसलिए कार्यरूप विवर्तके लक्षणका परिष्कार हुआ—'उपादानत्वाभिमतवस्तुनः सकाशात् वस्तुतो भेदाभेदाभ्यां दुर्निरूपत्वे सति कार्यत्वम् । अविद्यामें अतिव्याप्तिका वारण करनेके लिए विशेष्यदल है । आरम्भवादमें और परिणामवादमें क्रमशः अभेद और भेदसे कार्यका निरूपण अशक्य होनेसे उस स्थलमें दोषवारण करनेके लिए 'भेदाऽभेदाभ्याम्' इतना लक्षण-कुक्षिमें निविष्ट है, सिद्धान्तमें कार्य और कारणमें अभेदका उपगम होनेसे असम्भवका वारण करनेके लिए 'वस्तुतः' कहा गया है ।

कार्य और कारणका परस्पर भेद है या अभेद है, इसका निर्वचन नहीं कर सकते, क्योंकि उनका यदि भेद माना जाय, तो उसपर यह शङ्का होती है कि 'घट ही मृत्तिका है, तन्तु ही पट हैं और सुवर्ण ही कुण्डल है, इस प्रकार सामानाधिकरण्य कैसे होगा, भेदमें सामानाधिकरण्य नहीं देखा जाता । अन्यथा रासभ और उष्ट्रका भी परस्पर सामानाधिकरण्य होने लगेगा, और विशेषरूपसे समालोचना करनेपर मृत्तिकासे पृथक् घट या तन्तुओंसे अतिरिक्त पट देखनेमें नहीं आता । यदि कारण और कार्य भिन्न होते तो अवश्य कार्य और कारणका पृथक्रूपसे अस्तित्व देखा जाता ।

दूसरी बात यह है कि कारकव्यापारके पूर्व क्षणमें भी मृत्तिकामें घटकी सत्ताका स्वीकार करना चाहिए, ऐसा न माननेपर शशशृङ्गके समान असत् पदार्थकी उत्पत्तिके अभावका प्रसङ्ग आवेगा और उत्पत्तिकालके पूर्वमें असत् कार्यको माननेमें उत्पत्ति क्रियाके प्रति कर्तृत्वकी उपपत्ति नहीं होगी और शशशृङ्ग आदि असत् पदार्थोंकी भी उत्पत्ति प्रसक्त होगी । इन युक्तियोंसे हम कार्यके अस्तित्वका स्वीकार करनेके लिए बाध्य होते हैं तो पूर्वमें कार्य और कारणके अभेदकी सिद्धि भी