Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 71 of 590

Read in context
Page 71

विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४३


यदि च वेदान्ततात्पर्यविचाररूपं श्रवणम्, तदा तस्य तात्पर्यनिर्णयद्वारा वेदान्ततात्पर्यभ्रमसंशयरूपप्रतिबन्धकनिरास एव फलम्; न प्रतिबन्धकान्तरनिरासो ब्रह्मावगमो वा। तत्फलकत्वं च तस्य लोकत एव प्राप्तम्। साधनान्तरं च किञ्चिद्विकल्प्य समुच्चित्य वा न प्राप्तमिति न तत्र विधित्रयस्याऽप्यवकाशः।


इत्यादि। [ तात्पर्य यह है यदि 'श्रोतव्यः' इत्यादि वेदान्तवाक्य विधायक नहीं हैं, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि विधायक-वाक्योंमें तव्यप्रत्यय निरर्थक होंगे ? इस प्रश्नपर भगवान् भाष्यकारका कहना है कि निरर्थक नहीं हैं, क्योंकि उन तव्य आदि प्रत्ययोंसे श्रवण आदिकी स्तुति होती है। जो मुमुक्षु श्रवण आदिमें मोक्षकी साधनताका अनुभव करके भी संन्यास, ब्रह्मचर्य आदिके अनुष्ठानके क्लेशोंसे उनमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त नहीं होता और साधारणतया प्राप्त वर्णाश्रमके अनुकूल कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनसे निवृत्ति नहीं पाता है, उन वर्णाश्रम कर्मोंमें आत्यन्तिक मोक्ष-साधनताके अभावका अनुसन्धान कराते हुए ये 'तव्य' आदि प्रत्यय उसके प्रति श्रवण आदिकी प्रशंसा करते हैं अर्थात् 'मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण उत्साहसे श्रवण आदिमें ही प्रवृत्त हो, क्योंकि वे ही मुक्तिके साधन हैं' इस प्रकार प्रशंसा द्वारा 'तव्य' आदि प्रत्यय पुरुषके प्रवर्तक हैं, अतः विधायक न होनेपर भी 'तव्य' आदि प्रत्यय निरर्थक नहीं हैं ]।

यदि श्रवणको ज्ञानरूप न मानकर वेदान्ततात्पर्यविचाररूप ही मानें, तो भी तात्पर्यनिश्चय द्वारा वेदान्तोंके तात्पर्यभ्रम या तात्पर्यसंशयरूप प्रतिबन्धकका निराकरण ही श्रवणका फल है; अन्य प्रतिबन्धकका—पापका निरास या ब्रह्मज्ञान उसका फल नहीं है। भ्रमादिरूप जो प्रतिबन्धक है, उसका निराकरणरूप श्रवणका फल तो लोकसे ही प्राप्त है और अन्य साधन—अर्थात् ब्रह्मज्ञानमें श्रवण आदिसे अन्य कोई कारण विकल्पसे या समुच्चयसे प्राप्त भी नहीं है, इसलिए तीन विधियोंमें से किसी भी विधिका अवकाश नहीं है।


है, 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिस्थ तव्य प्रत्यय उस पुरुषकी स्वाभाविक बाह्य प्रवृत्तिको हटाकर प्रशंसा द्वारा आभ्यन्तर प्रवृत्ति कराते हैं।

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi · Page 71 of 590 · SarvaKosh