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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 70 of 590

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Page 70

४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

अत एव समन्वयसूत्रे ( उ० मी० अ० १ पा० १ सू० ४ ) आत्मज्ञानविधिनिराकरणानन्तरं भाष्यम्—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादीनि वचनानि विधिच्छायानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः' इत्यादि ।

में क्या हानि है ? इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप है, क्योंकि बृहदारण्यके ४र्थ और ६ष्ठ अध्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमें भगवती श्रुति कहती है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' । अनन्तर छठे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते' और चौथे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेन' इस प्रकार निदिध्यासनके अनुवादके लिए विज्ञानशब्दका प्रयोग किया गया है, इससे वार्तिककार ज्ञानरूपसे निदिध्यासनका भी अङ्गीकार करते हैं, अतः 'अपरायत्तबोधोऽत्र निदिध्यासनमुच्यते' इस प्रकार वार्तिककारकी उक्ति भी उपलब्ध होती है। इसलिए मनन आदिका ज्ञानरूपसे अङ्गीकार होनेसे दृष्टान्तासिद्धि नहीं है—अब प्रसङ्गसे यहाँ एक शङ्का यह भी होती है—निदिध्यासन और दर्शनके अर्थात् 'निदिध्यासितव्यः' और 'द्रष्टव्यः' इन दो पदोंके एकार्थक होनेसे पुनरुक्ति होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस शब्दसे विचारप्रयोजक—विचारमें प्रवृत्तिके उपयुक्त आपाततः दर्शनका अनुवाद है और 'निदिध्यासितव्यः' इस शब्दसे विचारका फलभूत जो साक्षात्कार है, उसका अनुवाद है, अतः पुनरुक्ति नहीं है ]।

[ श्रवणमें विधि नहीं है, इसमें भाष्यकी सम्मति भी है ] इसीसे—श्रवण और मनन आदिके ज्ञानरूप होनेके कारण विधिके अयोग्य होनेसे—'तत्तु समन्वयात्' इस समन्वयसूत्रमें आत्मज्ञानकी विधिके निराकरणके पश्चात् भाष्य है—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मावा अरे....ब्रूमः' इत्यादि। (यदि आत्मज्ञानकी विधि नहीं है, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि 'अध्येतव्यः' इत्यादि विधिके समान वचन किसलिए हैं ? स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषयसे विमुख करनेके लिए ऐसे वचन हैं, ऐसा हम कहते हैं)


* स्वभावसे—अविद्यासे होनेवाली प्रवृत्तिका नाम स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
† इसमें आदिशब्दसे 'यो हि बहिर्मुखः पुरुषः प्रवर्तते' 'इष्टञ्च मे भूयादनिष्टञ्च मा भूत्' इत्यादि भाष्यका संग्रह करना चाहिए, इस भाष्यका अभिप्राय है कि जो पुरुष बहिर्मुख है, वह मुझे इष्ट वस्तु प्राप्त हो और अनिष्ट प्राप्त न हो, इस बुद्धिसे बाहरके विषयोंमें ही प्रवृत्त होता