सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextविधिविचार ] भाषानुवादसहित ३३
त्मकचेतोवृत्तिविशेषरूपस्य श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्, तस्य शब्दादिप्रमाणफलत्वात् । न चोक्तरूपविचारावधारिततात्पर्य-विशिष्टशाब्दज्ञानमेव श्रवणमस्तु तस्य ब्रह्मज्ञानं फलं युज्यत इति वाच्यम्, ज्ञाने विध्यनुपपत्तेः । श्रवणविधेर्विचारकर्तव्यताविधायकजिज्ञासासूत्रमूलत्वो-
या अपरोक्ष फल नहीं है, क्योंकि परोक्ष या अपरोक्ष ज्ञानरूप फल शब्द आदि प्रमाणोंसे ही उत्पन्न होता है। परन्तु यहाँ यह 'श्रवणशब्दका अर्थ नहीं है, प्रत्युत अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य करानेवाले न्याय-विचारोंसे निश्चित तात्पर्यसे युक्त जो शाब्दज्ञान—शब्दजनित ज्ञान—है, वही प्रकृतमें श्रवण पदार्थ है, और उससे ब्रह्मज्ञानरूप फल हो सकता है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ज्ञानमें विधिकी उपपत्ति नहीं हो सकती अर्थात् श्रवणके ज्ञानरूप होनेसे ज्ञानात्मक श्रवणकी विधि नहीं होगी—ज्ञान विषयतन्त्र है विधेय नहीं है। और श्रवणविधि विचार-कर्तव्यताके † विधायक जिज्ञासासूत्रकी मूल है, ऐसा स्वीकार भी किया
तात्पर्यनिर्णयानुकूल कहा। तात्पर्यका निश्चय करनेमें उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन छःकी आवश्यकता होती है, इसी अर्थमें प्रामाणभूत एक श्लोक भी है—
उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् ।
अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये ॥
छान्दोग्यके षष्ठ अध्यायमें 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्मका उपक्रम करके 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' इस प्रकार उपसंहार किया गया है, इसलिए वहाँके सम्पूर्ण सन्दर्भका तात्पर्य उपक्रम और उपसंहारके ऐक्यसे अद्वितीय ब्रह्ममें ही है। 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका नौ वार पाठ है, इसलिए अभ्यासरूप तात्पर्यलिङ्गसे इसका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य माना गया है। 'यं वै सोम्य' इत्यादिसे अन्य प्रमाणोंके अयोग्यत्वकथनसे अपूर्वरूप लिङ्गसे अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय होता है। 'तस्य तावदेव' इत्यादिका तात्पर्य भी अद्वितीय ब्रह्ममें है, क्योंकि विदेहकैवल्य-रूप फलका कथन है। 'अनेन जीवेन' इसका अर्थवादरूप प्रमाणसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निश्चित होता है, 'एकेन मृत्पिण्डेन' इत्यादिका उपपत्तिसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निर्णीत होता है।
अन्तःकरणके वृत्तिविशेषके कथनसे यत्नसाध्य क्रियावृत्तिकी विवक्षा है। तदसाध्य ज्ञानरूप वृत्तिकी विवक्षा नहीं है, क्योंकि ज्ञान विधिके अयोग्य है। मूलमें 'ब्रह्मणि' यह सप्तमी विषयार्थक है, इसलिये ब्रह्मविषयक परोक्ष या अपरोक्ष फल श्रवणका नहीं हो सकता, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† ब्रह्मजिज्ञासासूत्र है—'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' । इसका अर्थ है कि वैराग्य आदि साधन-