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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 60 of 590

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Page 60

३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह प्रथम परिच्छेद


सहकृतश्रोत्रेण परस्परासङ्कीर्णतयाथार्थ्यापरोक्ष्यदर्शनेन प्रकाशमाने वस्तुन्यारोपिताविवेकनिवृत्त्यर्थशास्त्रसद्भावे तच्छ्रवणं तत्साक्षात्कारजनकेन्द्रियसहकारिभावेनोपयुज्यते इत्यस्य कॢप्तत्वादित्यपरे ।

ऊहापोहात्मिका चित्तक्रियैव श्रवणं विधेः ।
अपरोक्षं परोक्षं वा नाऽमानस्यास्य तत्फलम् ॥ १० ॥
तस्मात् पुन्दोषतात्पर्यभ्रान्तिसंस्कारशान्तये ।
नियमोऽस्येति सङ्क्षेपशारीरककृतो विदुः ॥ ११ ॥

ऊहापोहात्मक मानसिक क्रिया ही श्रवण है, अतः अप्रमाणरूप इस श्रवणकी विधिसे आत्माका अपरोक्ष या परोक्षज्ञानलक्षण फल नहीं हो सकता है, इससे पुरुषगत तात्पर्यभ्रम या उसके संस्कार आदि दोषोंकी शान्तिके लिए यह श्रवण नियम विधि है, ऐसा संक्षेपशारीरककार—सर्वज्ञात्ममुनि मानते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥

वेदान्तवाक्यानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यनिर्णयानुकूलन्यायविचारा-

अज्ञानसे—गन्धर्वशास्त्रके अनभ्यासप्रयुक्त अज्ञानसे आरोपित जो परस्पर एकरूपता है, उसकी निवृत्तिके लिए गान्धर्वशास्त्रीय विचारसहकृत श्रोत्रसे उन षड्जादि स्वरोंकी परस्पर असंकीर्णता और यथार्थ अपरोक्षताका दर्शन होनेसे प्रकाशमान वस्तुमें आरोपित अविवेकनिवृत्तिरूप प्रयोजनवाले शास्त्रके सद्भावमें उस शास्त्रका श्रवण प्रकाशमान वस्तु साक्षात्कारकी कारण इन्द्रियके सहभावसे साक्षात्कारका हेतु हो सकता है, इस प्रकार वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कार करणभूत इन्द्रियकी सहकारिता निश्चित है, अतः विधिके बिना भी प्राप्त होनेसे यह अपूर्वविधि नहीं है, प्रत्युत नियमविधि है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं।

वेदान्तवाक्योंका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य * निश्चय करानेवाला न्याय-विचारात्मक जो अन्तःकरणका परिणामरूप श्रवण है, उसका ब्रह्ममें परोक्ष


भेद प्रतीत नहीं होता—एकरूपता प्रतीत होती है, यह सभीके अनुभवसिद्ध है, इसलिए यहाँ भी विचारवान् पुरुष षड्जादि स्वरोंके साक्षात्कारके दृष्टान्तसे कल्पना करता है कि यदि आरोपनिवर्तक शास्त्र है, तो उस आरोपनिवर्तक शास्त्रके सहकारसे आन्तर इन्द्रिय ही बुद्धि आदिसे विविक्त आत्माका, जो ब्रह्मरूपसे वेदान्तोंसे प्रतीत होता है, साक्षात्कार करावेगा । इसी भावको 'प्रकाशमान' इत्यादिसे व्यक्त करते हैं ।

* प्रमेयकी असम्भावनाका निवर्तक जो मनन है उसमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए