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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 587 of 590

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Page 587

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहिते ५५७


नुवर्तमानो यत्किञ्चिदर्थगोचरः कश्चिदस्त्यवितथसंकल्पस्तिरोहित इति परैरपीष्यते । किन्त्वीश्वरस्य यन्नित्यसिद्धं निरवग्रहं सत्यसङ्कल्पत्वम्, तदेव जीवस्य संसारदशायामीश्वराभेदानभिव्यक्त्या स्वकीयत्वेनाऽनवभासमानं तं प्रति तिरोहितमित्येव समर्थनीयमिति घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्तः ।

नन्वपहतपाप्मत्वं न पाप्मविरहः, किन्तु पाप्महेतुकर्माचरणेऽपि पापोत्पत्तिप्रतिबन्धकशक्तियोगित्वमिति न तस्य नित्यसिद्धत्वेन बन्धस्य मिथ्यात्वप्रसङ्गः । एवं सत्यसङ्कल्पत्वमपि शक्तिरूपेण निर्वायमिति


सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा यदि नहीं मानते हैं, तो सर्वार्थको विषय करनेवाला सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा कैसे मान सकते हैं ? किन्तु ‡ ईश्वरका निरवद्य जो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व है, उसीका, जीवकी संसारदशामें ईश्वरके साथ अभेदकी अनभिव्यक्तिसे अपने प्रति स्वसम्बन्धित्वेन अनवभासमान होकर उसके प्रति, तिरोधान होता है, ऐसा समर्थन करना होगा, इससे घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही प्रसक्त होगा ।

यदि शङ्का हो कि* पापसम्बन्धसे रहितत्व अपहतपाप्मत्व नहीं है, किन्तु पापके हेतुभूत कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक-शक्तिसम्बन्धितारूप है, इसलिए उसके नित्यसिद्ध होनेपर भी संसारमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, इसी प्रकार शक्तिरूपसे† सत्यसङ्कल्पत्वकी भी व्याख्या करनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रकारके


‡ यदि द्वितीय विकल्पका अङ्गीकार किया जाय, तो आखिरमें सिद्धान्तीका ही पक्ष मानना होगा, इससे पारमार्थिक भेद नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।

* इस ग्रन्थसे भेदवादी यह शङ्का करता है कि अपहतपाप्मत्वका परिष्कार हम ऐसा करते हैं कि जिससे संसार वास्तविक माना जाय, तो भी अपहतपाप्मत्वके साथ विरोध नहीं है ।

† क्लिद्य, निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप जिस शक्तिकी तुम अपहतपाप्मशब्दके अर्थरूपसे कल्पना करते हो, उसकी क्या इसलिए कल्पना करते हो कि विद्याके उदयके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो, अथवा विद्याके बाद ? तुम्हारे मतमें होनेवाली मुक्तिके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो अथवा तुम्हारे मतके अनुसार मुक्तिके कालमें देह आदिके रहनेके कारण कदाचित् पापके हेतुभूत निषिद्ध कर्मोंका आचरण हो सकता है, अतः उसका प्रतिबन्ध हो ? इस प्रकारके तीन विकल्पोंका मनमें निश्चय करके क्रमशः इस ग्रन्थसे उन विकल्पोंका परिहार करते हैं ।