सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context५५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद
विर्भावप्रतिपादनेन च विरोधः स्यादिति नित्यसिद्धं वाच्यमिति बन्धस्य मिथ्यात्वं दुर्वारम्, नित्यसिद्धमपहतपाप्मत्वं हि सर्वदा पाप्मरहितत्वम् । न च वस्तुतः सर्वदा पाप्मरहिते पाप्मसम्बन्धः, तन्मूलककर्तृत्वभोक्तृत्वसम्बन्धो वा पारमार्थिकः सम्भवति । एवं च जीवस्येश्वराभेदोऽपि दुर्वारः, श्रुतिबोध्यतदभेदविरोधिबन्धस्य सत्यत्वाभावात् । अन्यथा संसारिणि नित्यसिद्धसत्यसङ्कल्पतिरोधानोक्त्ययोगाच्च । नहि जीवस्य संसारदशायाम-
प्रतिपादनसे विरोध होगा, इससे अपहतपाप्मत्व आदिको नित्यसिद्ध मानना चाहिए, इससे बन्धका मिथ्यात्व दुर्वार है । क्योंकि नित्यसिद्ध अपहतपाप्मत्व—सर्वदा पाप्मसम्बन्धसे रहितत्वरूप ही है । अतः वास्तविक पापसम्बन्धसे जो रहित है, उसमें पापका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है, तथा पापसम्बन्धमूलक कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिके सम्बन्ध भी नहीं रह सकते । बन्धके मिथ्या होनेपर जीवका ईश्वरके साथ अभेद भी दुर्वार है, क्योंकि * श्रुतिसे बोधित ब्रह्माभेदका विरोधी संसार सत्य नहीं हो सकता है। यदि संसारके मिथ्यात्वका अङ्गीकार न करके जीव और ब्रह्मका अभेद न माना जाय, तो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व आदिका तिरोधान जो ‘पराभिध्यानात्’ इत्यादि सूत्रमें सूत्रकारने कहा है, वह अयुक्त हो जायगा, क्योंकि अन्य लोग भी जीवकी संसारदशामें एकाध अर्थको विषय करनेवाला एक
* यदि यहांपर शङ्का हो कि संसारके मिथ्यात्वके प्रतिपादनसे क्या लाभ है, क्योंकि उसके क्षय होनेपर भी जीव और ब्रह्मका अभेद बोधित हो सकता है । इस प्रकारके भास्करके मतको लेकर कहते हैं कि संसारको सत्य माननेपर परमात्मामें रहनेवाले नित्यमुक्तत्वका भी सत्यत्वरूपसे ही अङ्गीकार करना चाहिए, इससे परमार्थस्वरुप विरुद्ध धर्मोंसे आक्रान्त जीव और ब्रह्मका अग्नि और हिमके समान श्रुतिसे बोधित अभेद हो ही नहीं सकता है ।
† यदि शङ्का हो कि तिरोधानका प्रयोग कैसे हो सकता है ? तो इसपर कहना चाहिए कि जीवमें रहनेवाले नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्वका तिरोधान ‘पराभिध्यानात्तु०’ इत्यादि सूत्रसे कहा जाता है। अथवा ईश्वरगत सत्यसङ्कल्पत्वका जीवके प्रति तिरोधान उक्त सूत्रसे कहा जाता है। इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि पूर्वपक्षी साधारण अर्थको विषय करनेवाले एक सत्यसङ्कल्पको भी तिरोहित नहीं मानता है, तो सब धर्मोंको विषय करनेवाले सत्यसङ्कल्पको कैसे मानेगा ?