सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextमुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४९
साधनाध्यायेऽपि 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १) इत्यधिकरणे स्वप्नप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वे व्यवस्थापिते तत्र मिथ्याभूते स्वप्नप्रपञ्चे जीवस्य कर्तृत्वमाशङ्क्य 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० ५) इति सूत्रेण 'जीवस्येश्वराभिन्नत्वात् सदपि सत्यसङ्कल्पत्वादिकमविद्यादोषात्तिरोहितमिति न तस्य स्वप्नप्रपञ्चे स्रष्टृत्वं सम्भवति' इति वदन् सूत्रकारः, तत्पुनस्तिरोहितं सत् परमभिध्यायतो यतमानस्य जन्तोर्विधूतध्वान्तस्य तिमिरतिरस्कृतत्वे दृक्शक्तिरौषधवीर्यादीश्वरप्रसादात्संसिद्धस्य कस्यचिदेवाविर्भवति, न स्वभावत एव सर्वेषां जन्तूनाम्' इति तत्सूत्राभिप्रायं वर्णयन्
साधनाध्यायमें भी * 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' इस अधिकरणमें स्वप्नप्रपञ्चके मिथ्यात्वके व्यवस्थित होनेपर उस मिथ्याभूत स्वप्नके प्रति जीवकी कर्तृताकी आशङ्का करके † 'पराभिध्यानात् ०' ‡ इस सूत्रसे— 'जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इसलिए यद्यपि उसमें सत्यसङ्कल्पत्व आदि विद्यमान हैं, तथापि वे अविद्यादोषसे तिरोहित हैं, इसलिए जीव स्वप्नका स्रष्टा नहीं हो सकता है'— इस प्रकार कहते हुए सूत्रकारने और 'यद्यपि वह सत्यसङ्कल्पत्व आदि तिरोहित है, तथापि परमात्माकी उपासनामें प्रयत्नशील किसी जीवविशेषको—तिमिररोगसे तिरस्कृत लोचनशक्ति औषधके प्रभावसे जैसे प्राप्त होती है, वैसे ईश्वरके प्रसादसे अविद्याके विनष्ट होनेसे सत्यसङ्कल्पत्व आदिका आविर्भाव होता है, स्वभावतः × सब प्राणियोंमें उसका आविर्भाव नहीं होता, इस
* साधनाध्यायमें अर्थात् ब्रह्मविद्याके साधनीभूत वैराग्य आदिका प्रतिपादन करनेवाले तृतीय अध्यायमें सूत्रकारने और उनके अभिप्रायका वर्णन करते हुए भाष्यकारने भी मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति बतलाई है। इस प्रकार संक्षेपमें इस समुदित ग्रन्थका भाव है। जाग्रत् और सुषुप्तिके सन्धिस्थानमें अर्थात् स्वप्नस्थानमें रथादिसृष्टि सत्य ही हो सकती है, क्योंकि 'अथ रथान्' इत्यादि श्रुति उसके सत्यत्वमें प्रमाण है, यह सूत्रका आशय है।
† कर्तृत्वकी आशङ्का करके अर्थात् जिस प्रकारसे अग्निके अंशभूत विस्फुलिङ्गमें अग्निके समान दाहकत्वशक्ति है, उसी प्रकार परमेश्वरका अंश जीव भी स्वप्न आदि सृष्टिमें प्रयोजक सत्यसङ्कल्पत्व आदि सामर्थ्ययुक्त है, अतः जीव स्वप्नसृष्टिका कर्ता हो सकता है, इस प्रकारकी आशङ्का करके, यह भाव है।
‡ इस सूत्रका तात्पर्य मूलमें ही स्पष्ट है।
× अर्थात् वैराग्य आदि साधनोंके बिना नहीं होता है, यह भाव है।