सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context५४८ | सिद्धांतलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद
इत्यधिकरणे 'जीवस्येश्वरांशत्वाभ्युपगमे तदीयेन संसारदुःखभोगेन ईश्वरस्यापि दुःखित्वं स्यात् । यथा लोके हस्तपादाद्यन्यतमांशगतेन दुःखेनांशिनो देवदत्तस्यापि दुःखित्वम्, तद्वत् । ततश्च तत्प्राप्तानां महत्तरं दुःखं प्राप्नुयात्, ततो वरं पूर्वावस्था संसार एवास्त्विति सम्यग्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गः' इति शङ्काग्रन्थेन भामत्यादिषु स्पष्टीकृतं बिम्बप्रतिबिम्बभावकृतासङ्करमुपादाय समाहितेन भाष्यकारो मुक्तस्य ईश्वरभावापत्तिं स्पष्टीचकार ।
पराभिध्यानात् सत्यकामत्वादितिरोहितेः ।
नाशे मुक्तौ पुनस्तेषामाविर्भावस्य चेरणात् ॥ २१ ॥
ईश्वरके बार बार अभिध्यानसे—संसारदशामें जो सत्यकामत्व आदि तिरोहित धर्म हैं, उनके तिरोधानका विनाश होनेपर मुक्तिमें उन गुणोंका पुनः—आविर्भाव होता है, ऐसा साधनाध्यायमें कहा गया है, इससे भी मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति मानी गई है ॥२१॥
निम्न लिखित शङ्काग्रन्थसे, जिसका कि भामती आदि निबन्धोंमें स्पष्टरूपसे बतलाये गये बिम्बप्रतिबिम्बभावकृत असाङ्कर्यका * ग्रहण करके ही समाधान किया गया है, मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिका ही विशदीकरण किया है। भाष्यका वह शङ्काग्रन्थ इस प्रकार है—'जीवको ईश्वरका अंश माननेपर जीवके सांसारिक दुःखके उपभोगसे अंशीरूप ईश्वरको भी दुःखका उपभोग वैसे ही प्रसक्त होगा, जैसे कि लोकमें हाथ, पैर आदि किसी अंशके दुःखित होनेपर अंशी देवदत्त भी दुःखित होता है। इससे ईश्वरभावको प्राप्त हुए जीवोंको बड़ा दुःख प्रसक्त होगा, इससे ईश्वरप्राप्तिकी अपेक्षा पहलेसे अवस्थित संसार ही उचित है, इस बुद्धिसे ईश्वरप्राप्तिके उपायभूत सम्यक्ज्ञानमें कोई भी प्रवृत्त नहीं होगा, इससे सम्यक्ज्ञान निरर्थक हो जायगा ।
* भामतीमें साङ्कर्यका परिहार इस आशयसे किया गया है, अविद्यामें प्रतिबिम्ब जीव ही ईश्वरके अंशरूपसे कहे गये हैं, हाथ, पैर आदि अवयवोंके समान अवयवत्वरूपसे नहीं, वैसे ही ईश्वर भी बिम्बरूपसे अंशी कहा गया है, अवयवित्वरूपसे नहीं, प्रतिबिम्ब और बिम्बके धर्मोंका लोकमें परस्पर साङ्कर्य नहीं देखा जाता है, अतः जीवके दुःखका ईश्वरमें प्रसङ्ग नहीं है।