सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextअविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१७
उत्पत्तिरिव नाशोऽपि क्षणिका भावविक्रिया ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तद्वृत्तिकालेति तां विदुः ॥ ७ ॥
उत्पत्तिके समान विनाश भी अविद्यावृत्तिकालिक क्षणिक भावका विकार ही है, अतः अनिर्वचनीय है, ऐसा अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं ॥ ७ ॥
अविद्यावत्तन्निवृत्तिरप्यनिर्वाच्यैव । न च तदनुवृत्तौ तदुपादानाज्ञानस्याप्यनुवृत्तिनियमाद् अनिर्मोक्षप्रसङ्गः, तदनुवृत्तौ प्रमाणाभावात्; उत्पत्तेः
विलक्षण कोई पञ्चम प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, ऐसा आनन्दबोधाचार्य * कहते हैं ।
अविद्या जैसे अनिर्वचनीय है, वैसे ही अविद्याकी निवृत्ति भी अनिर्वचनीय है । यदि शङ्का हो कि मुक्तिमें अविद्यानिवृत्तिकी अनुवृत्ति होगी, तो उसके उपादानभूत अविद्याकी भी अनुवृत्ति होनेसे अनिर्मोक्षकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवृत्तिकी अनुवृत्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, कारण कि जैसे † घटादि पदार्थोंकी उत्पत्ति केवल
* इस विषयमें आनन्दबोधाचार्यजीका विस्तृत विचार उनके बनाये हुए न्यायमकरन्द ग्रन्थमें देखना चाहिए [ पृ० ३५२ काशी चौखम्भा मुद्रित ] उसका कुछ अंश इस प्रकार है:—
नन्विद्याक्षतेः सत्त्वे सद्वितीयत्वमात्मनः ।
मिथ्याभावे त्वनिर्मोक्षो मूलाविद्याव्यवस्थितेः ॥
उक्तमेतदविद्यास्तमयो मोक्ष इति । तत्रैतद्विचायते—स किं सत्यो मिथ्या वेति..................... अतः कथमविद्याव्यावृत्तिमोंक्ष इति ।
न सन्नासन्न सदसन्नानिर्वाच्योऽपि तत्क्षयः ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याचार्या व्यचीचरन् ॥
अर्थात् अविद्यानिवृत्तिको सत्य मानें, तो द्वैतापत्ति होगी, उसे मिथ्या मानें, तो अविद्याका अवस्थान प्रसक्त होगा क्योंकि मिथ्याभाव अविद्या अथवा अविद्याका कार्य होता है, इसलिए अनिर्मोक्ष प्रसक्त होगा, पूर्वमें जो अविद्यास्तमय मोक्ष कहा गया है उसके वारेमें विचार किया जाता है कि वह सत्य है या मिथ्या........................इस प्रकारके अनेक सत्यत्वादि विकल्पोंसे अविद्यानिवृत्तिका निर्वचन नहीं हो सकता, इसलिए अविद्यानिवृत्ति मोक्ष कैसे हो सकती है । इसपर कहते हैं—अविद्यानिवृत्ति सत् नहीं है, असत् नहीं है, सदसत् नहीं है और अनिर्वाच्य भी नहीं है, किन्तु इन चार कल्पोंसे भिन्न पञ्चम प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, यह भाव है ।
† भाव यह है कि जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनमें उत्पत्ति नामका एक भावरूप विकार है, जो केवल एक ही क्षणमें याने उत्पत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, सर्वदा नहीं रहता, यह अनुभवसिद्ध है, वैसे ही निवृत्ति भी (विनाश भी) पदार्थोंका भावरूप धर्म ही है, जो