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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 545 of 590

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Page 545

अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१५

विद्याया विद्यमानतया अनर्थमपि तिष्ठेदिति तदन्वेषणात् । 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम्, यद्व्यतिरेके चाऽभावः, तत् तत्साध्यम्' इति

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानके न होनेपर अनर्थकी कारणीभूत अविद्याके विद्यमान होनेसे अनर्थकी अवस्थिति अवश्य होगी, इसलिए अनर्थ-निवृत्तिकी अभिलाषा करके ज्ञानकी अन्वेषणा हो सकती है [ पूर्वपक्ष तथा समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि अविद्याकी निवृत्ति आत्मस्वरूप मानी जाय, तो अविद्यानिवृत्तिरूप आत्माके सर्वदा प्राप्त होनेसे उसकी प्राप्तिके लिए कोई भी यत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, इसलिए अविद्याकी निवृत्तिका हेतुभूत तत्त्वज्ञान व्यर्थ ही है। यह पूर्वपक्षीका कहना है । इसपर समाधान कर्ता पूर्वपक्षीसे पूछता है कि तत्त्वज्ञानको व्यर्थ बतलानेके पहले तुम्हें कहना चाहिए कि तत्त्वज्ञान क्यों व्यर्थ है, क्या तत्त्वज्ञानका कुछ प्रयोजन नहीं है, इसलिए तत्त्वज्ञान व्यर्थ है अथवा अविद्यानिवृत्तिके आत्मस्वरूप होनेपर उसके अनादि होनेसे ज्ञानके बिना भी वह सिद्ध है, अतः अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य नहीं हो सकती इसलिए तत्त्वज्ञान व्यर्थ है ? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानसाधनके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति हो सकती है, क्योंकि ज्ञानके न रहनेपर अनर्थकी हेतुभूत अविद्याके रहनेसे अनर्थका भी अवस्थान हो सकता है, इस प्रकार ज्ञानाभावदशामें अनर्थका सम्भव हो सकता है, इसलिए अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानके साधनोंके अनुष्ठानमें भी पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, अतः प्रयोजनके अभावसे ज्ञान- व्यर्थ है, ऐसा नहीं कह सकते हो । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ]* जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसकी सत्ता हो और जिसका अभाव होनेपर जिसका अभाव हो, वह उससे साध्य होता है, इस प्रकारके साध्यलक्षणके अनुरोधसे आत्मस्वरूप


* साध्यका लक्षण दो प्रकारका होता है, एक तो केवल सादिपदार्थके लिए जन्यत्वरूप और दूसरा सादि और अनादि पदार्थोंके लिए 'यस्मिन्सति' इत्यादिरूप, इसलिए आत्मस्वरूप अविद्यानिवृत्तिमें जन्यत्वरूप प्रथम लक्षणके न होनेपर भी द्वितीय लक्षण है, अतः अविद्यानिवृत्तिमें ज्ञानसाध्यत्वकी उपपत्ति हो सकती है। जैसे घटके प्रति मृत्तिका कारण है और घट मृत्तिकासे साध्य है, इसमें यह लक्षण घटता है, क्योंकि मृत्तिकाके रहनेपर उत्तरक्षणमें घटकी सत्ता है और मृत्तिकाके अभावमें घटका भी अभाव है, इसलिए घट मृत्तिकासे साध्य कहलाता है, इस प्रकार लक्षणसमन्वय करना चाहिए, यह भाव है।

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