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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 54 of 590

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Page 54
२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

पत्तेः । अभ्युपगम्यते हि कर्त्रधिकरणे व्युत्पादितम्—पुरुषार्थेऽनृतवदननिषेधे सत्यपि दर्शपूर्णमासमध्ये कुतश्चिद्धेतोरङ्गीकृतनिषेधोल्लङ्घनस्याऽविकलां क्रतुसिद्धिं कामयमानस्याऽनृतवदने प्रवृत्तिस्स्यादिति पुनः क्रत्वर्थतया दर्शपूर्णमासप्रकरणे 'नानृतं वदेत्' इति निषेध इति क्रत्वर्थतया निषेधस्याऽर्थवत्त्वम् ।


है,] क्योंकि दर्शपूर्णमासमें * पुरुषार्थरूप असत्यभाषणनिषेधके रहनेपर भी किसी कारणवश निषेधके उल्लङ्घनका अङ्गीकार करके अविकल क्रतुसिद्धिकी अभिलाषा करनेवाला पुरुष अनृतवदनमें (असत्य भाषणमें) प्रवृत्त हो सकता है, इसलिए दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें क्रतुके अङ्गरूपसे 'नानृतं वदेत्' ( असत्य भाषण न करे ) ऐसा निषेध किया गया है, इस प्रकार कर्त्रधिकरणमें क्रत्वर्थरूपसे व्युत्पादित निषेधकी अर्थवत्ताका ( प्रकृतमें भी ) अङ्गीकार किया है ।


* इसका जिस अधिकरणमें विचार किया गया है, उसका नाम है—अनृतवदननिषेधस्य क्रतुधर्मत्वाधिकरण—असत्यभाषणके निषेधमें क्रतुधर्मताका प्रतिपादन करनेवाला अधिकरण; [ अधिकरण उसे कहते हैं, जिसमें संशय, विषय, पूर्वपक्ष, और सङ्गतिका प्रदर्शन करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया हो ] इसका विचार 'अकर्म क्रतुसंयुक्तं संयोगात् नित्यानुवादः स्यात्' इस सूत्रमें है। भावार्थ यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें 'नानृतं वदेत्' (असत्य भाषण न करे) यह वाक्य सुना जाता है। यहांपर—'यह उपनयनमें नित्य जो अनृतवदन निषेध है, उसका अनुवाद है अथवा अपूर्वविधि है ? इस प्रकारका संशय होनेपर पूर्वपक्षी—कहता है कि क्रतुसंयुक्त—क्रतुप्रकरणमें पठित अकर्म—'नानृतं वदेत्' यह असत्यभाषणनिषेधवाक्य नित्यानुवादः—नित्यानुवादरूप है। किससे ? इससे कि 'संयोगात्' अर्थात् उपनयनकालमें ही 'सत्यं वद' 'धर्मं चर', इस प्रकारके उपदेशसे अनृतवदनका निषेध नित्य ही प्राप्त है, इस प्रकार पूर्वपक्षकी प्राप्ति होनेपर—

सिद्धान्ती—'विधिर्वा संयोगान्तरात्' यह सूत्र कहते हैं, अर्थात् क्रतुप्रकरणमें पठित अनृतवदननिषेध विधि ही है, क्योंकि यह संयोगान्तर—अन्य संयोग है—उद्देश्यका भेद है। तात्पर्य यह है कि उपनयन कालमें जो विधि है, वह पुरुषको उद्देश्य करके प्रवृत्त हुई है और क्रतुप्रकरणमें जो अनृतवदननिषेधविधि है वह क्रतुको उद्देश्य करके प्रवृत्त है, अतः उद्देश्यका भेद होनेसे उक्त निषेधको क्रतुप्रकरणमें विधि ही मानना चाहिए—इस प्रकार सुबोधिनी वृत्तिमें [ पू० मी० सू १२-१३ अ० ३ पा० ४ पृ० १२४ काशीमुद्रित ] विचार किया गया है ।