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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 53 of 590

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Page 53

विधिविचार ] भाषानुवादसहित २५


अथवा अद्वैतात्मपरभाषाप्रबन्धश्रवणस्य पक्षे प्राप्त्या वेदान्तश्रवणे नियमविधिरस्तु । न च ‘न म्लेच्छितवै’ इत्यादिनिषेधादेव तदप्राप्तिः; शास्त्रव्युत्पत्तिमान्द्यात् वेदान्तश्रवणमशक्यमिति पुरुषार्थनिषेधमुल्लङ्घ्याऽपि भाषाप्रबन्धेनाऽद्वैतं जिज्ञासमानस्य तत्र प्रवृत्तिसम्भवेन नियमविधेरर्थवत्त्वोप-


अथवा अद्वैत आत्मतत्त्वबोधक भाषा-ग्रन्थोंके श्रवणकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए वेदान्तश्रवणमें यह नियमविधि है अर्थात् अद्वैत आत्माकी जिज्ञासा करनेवाला वेदान्तका ही श्रवण—विचार करे, भाषा-ग्रन्थोंका विचार न करे। यदि कोई कहे कि ‘न म्लेच्छितवै’ (भाषा-प्रबन्धरूप अव्यक्त शब्दोंका उच्चारण नहीं करना चाहिए) इत्यादि निषेधशास्त्र-से ही अद्वैतपरक भाषाप्रबन्धोंकी व्यावृत्ति हो जायगी, फिर भाषाप्रबन्धके श्रवणकी व्यावृत्तिके* लिए नियमविधि क्यों मानी जाय ? नहीं, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रीय व्युत्पत्तिकी न्यूनतासे वेदान्तके श्रवणका संभव न होनेसे पुरुषार्थनिषेधका उल्लङ्घन करके भी भाषाग्रन्थोंसे अद्वैत ब्रह्मकी जिज्ञासा करनेवालेकी भाषाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्ति हो सकती है, उसकी व्यावृत्तिके लिए नियमविधि सार्थक है । [भाव यह है कि ‘न म्लेच्छितवै’ इत्यादि जो भाषाप्रबन्धका निषेध है वह ज्ञानका अङ्ग नहीं है, पुरुषार्थ है। यदि ज्ञानाङ्ग होता, तो ज्ञानकी अनुत्पत्तिके भयसे उसमें पुरुष प्रवृत्त न होता, परन्तु पुरुषार्थ होनेसे उसका उल्लङ्घन करके महाफल—मोक्षके लिए भाषाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्त हो सकता है। भाषाप्रबन्धके श्रवणमें मनुष्यके प्रवृत्त होनेपर पक्षमें वेदान्तश्रवणकी अप्राप्ति होगी, अतः उसके अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए श्रवणविधिको नियमविधि मानना चाहिए । पुरुषार्थनिषेधका उल्लङ्घन करके महाफलकी अभिलाषासे निषिद्धमें प्रवृत्ति होती है, इसलिए उसकी निवृत्तिके लिए नियमविधिकी अर्थवत्ता मीमांसकोंने मानी


* यद्यपि नियमविधिका फल अप्राप्तांश परिपूरण ही है इतरव्यावृत्ति नहीं है, क्योंकि यह तो परिसंख्याविधिका फल है, तथापि नियमविधिका फल अयोग-व्यावृत्ति मीमांसकोंने माना है और अन्ययोगव्यावृत्ति परिसंख्याका फल माना है। अतः नियमविधिके फलमें व्यावृत्तिशब्दका प्रयोग कदाचित् आवे, तो अयोगव्यावृत्ति समझना चाहिए ।

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