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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 522 of 590

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Page 522
४९२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

द्विगुणीकृत्य वृत्त्ययोगेन चैकद्रव्यगुणानां स्वाश्रये सर्वत्र व्याप्य वर्तमानानां पृथक् पृथक् गगनावच्छेदकत्वस्येव चैतन्यावच्छेदकत्वस्याप्यसम्भवात्, तेषां स्वाश्रयद्रव्यावच्छिन्नचैतन्येनैव शुक्तीदंमंशावच्छिन्नचैतन्येन शुक्तिरजतवत् प्रकाश्यतया तस्याभिव्यक्तौ गन्धस्यापि प्रकाशस्य, अनभिव्यक्तौ रजतादेरप्यप्रकाशस्य चापत्तेः । न च गन्धाकारवृत्त्युपरक्ते एव चैतन्ये गन्धः प्रकाशते इति नियमः, प्रकाशसंसर्गस्यैव प्रकाशमानशब्दार्थत्वेनाऽसत्यामपि तदाकारवृत्तावनावृतप्रकाशसंसर्गे


चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेके कारण गन्धका प्रकाश नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यकी द्विगुणित * वृत्तिके न होनेसे तथा अपने आश्रयमें व्याप्यवृत्तित्वरूपसे वर्तमान एक द्रव्यमें अवस्थित गुणों का गगनावच्छेदकत्वके समान पृथक्-पृथक् चैतन्यावच्छेदत्वका भी सम्भव न होनेसे जैसे शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे शुक्तिरजतका † प्रकाश होता है, वैसे ही उन गुणोंका भी अपने आश्रय द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे ही प्रकाश होता है, इससे द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यके अभिव्यक्त होनेपर गन्धका प्रकाश भी प्रसक्त होगा, और यदि उक्त चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो रजत आदिका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का हो कि गन्धाकार वृत्तिसे उपरक्त चैतन्यके प्रकाशित होनेसे ही गन्धका प्रकाश होता है, यह नियम है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकाशसंसर्गके ही प्रकाशमानशब्दका अर्थ


* तात्पर्य यह है कि चैतन्य निरवयव है, इसलिए निरवयव चैतन्यमें द्रव्यावच्छेदेन एक और गुणावच्छेदेन दूसरी वृत्ति नहीं हो सकती है, और एक ही द्रव्यमें गन्ध आदि गुणोंका प्रदेशके भेदसे यदि अवस्थान माना जाय, तो एक द्रव्यमें गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त होगा, परन्तु गन्ध आदि गुण अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं, किन्तु व्याप्यवृत्ति हैं, अतः उक्त शङ्का भी नहीं हो सकती है । और घट आदि द्रव्य गगनके अवच्छेदक होते हैं, इससे उनके भेदसे गगनका भेद होता है, परन्तु गन्ध गगनका अवच्छेदक नहीं होता, वैसे ही गन्ध चैतन्यका भी अवच्छेदक नहीं होता । जिससे कि गन्धादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त हो ।

† अर्थात् शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यमें रजतका अध्यास होनेसे रजतका शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे अवभास होता है, उससे अतिरिक्त चैतन्यसे अवभास नहीं होता है, वैसे ही द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पितरूप आदिका भी द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे भी अवभास होता है, यह भाव है।